
यदि दोनों की स्थिति समान पाई जाती है तो याचिकाकर्ताओं को भी संबंधित कर्मचारियों के समान तिथि से नियमितीकरण का लाभ दिया जाए। न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की एकलपीठ ने लोचन प्रसाद पांडेय सहित अन्य कर्मचारियों की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिए। कोर्ट ने पूरी प्रक्रिया आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तारीख से 90 दिनों के भीतर पूरी करने को कहा है।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार वे गरियाबंद जिले के विभिन्न आदिवासी बालक आश्रमों और छात्रावासों में लंबे समय से दैनिक वेतनभोगी के रूप में कार्यरत हैं। उनका कहना था कि विभाग में उनके समान पद और योग्यता वाले कई कर्मचारियों को नियमित किया जा चुका है, जबकि उन्हें नियमितीकरण के लाभ से वंचित रखा गया।
याचिकाकर्ताओं ने बताया कि शासन के पांच मार्च 2008 के परिपत्र के आधार पर विभाग ने 28 फरवरी 2022 और 18 अक्टूबर 2024 को समान स्थिति वाले कई दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को नियमित किया था। इसके बावजूद लंबे समय से सेवा दे रहे याचिकाकर्ताओं के मामले पर समान आधार पर विचार नहीं किया गया।
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समान कर्मचारियों से रिकार्ड मिलाने का आदेश
याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि जब समान योग्यता, पद और सेवा अवधि वाले कर्मचारियों को नियमितीकरण का लाभ दिया गया है तो उन्हें इससे वंचित करना समानता के अधिकार के विपरीत है। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट के नरेंद्र कुमार तिवारी बनाम झारखंड राज्य मामले में दिए गए विधिक सिद्धांतों का भी हवाला दिया गया। हाई कोर्ट ने मामले में विभाग को यह जांचने का निर्देश दिया कि वर्ष 2022 और 2024 में नियमित किए गए कर्मचारियों तथा याचिकाकर्ताओं की सेवा संबंधी परिस्थितियां समान हैं या नहीं।
समान पाए जाने पर पिछली तिथि से लाभ
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि अभिलेखों की जांच में याचिकाकर्ताओं की स्थिति नियमित किए गए कर्मचारियों के समान पाई जाती है, तो उन्हें भी उन्हीं कर्मचारियों के समान तिथि से नियमितीकरण का लाभ दिया जाए। अदालत ने संबंधित अधिकारियों को यह पूरी प्रक्रिया 90 दिनों के भीतर पूरी करने के निर्देश दिए हैं। इस तरह हाई कोर्ट के आदेश से लंबे समय से नियमितीकरण की प्रतीक्षा कर रहे दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के मामले में विभागीय स्तर पर नए सिरे से विचार का रास्ता खुल गया है।