
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। थानों में दर्ज रूटीन अपराध, लॉ एंड ऑर्डर की स्थिति और लगातार वीआईपी ड्यूटी की व्यस्तता के कारण बहुचर्चित सर्पदंश फर्जी मुआवजा मामले की जांच की रफ्तार धीमी पड़ गई है। पुलिस की विवेचना जारी है, लेकिन जांच अधिकारियों की अन्य कार्यों में व्यस्तता के कारण कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रगति नहीं हो पा रही है।
मामले में आरोपियों और साक्षियों की बड़ी संख्या को देखते हुए कुछ थाना प्रभारी इसे एंटी करप्शन ब्यूरो ACB को सौंपने का सुझाव दे रहे हैं, हालांकि इस पर अंतिम निर्णय होना बाकी है।
विधानसभा में मामला उठने के बाद जिला प्रशासन की निगरानी में करीब एक वर्ष तक गहन जांच की गई थी। इसके बाद बिलासपुर तहसीलदार की शिकायत पर जिले के विभिन्न थानों में 15 अलग-अलग एफआईआर दर्ज कराई गईं। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए लीगल सिंडिकेट के अधिवक्ताओं, तहसील कार्यालय के रीडर, सिम्स के डॉक्टरों और दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों समेत 20 से अधिक आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा।
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फर्जी दस्तावेजों की फोरेंसिक जांच लंबित
पुलिस विवेचना में अधिवक्ताओं द्वारा प्रस्तुत पोस्टमार्टम रिपोर्ट, मर्ग इंटीमेशन और पटवारी प्रतिवेदन जैसे कई अहम दस्तावेज पूरी तरह फर्जी पाए गए हैं। इनमें से कई संदिग्ध हस्तलेख और हस्ताक्षरों को जांच के लिए फोरेंसिक लैब भेजा गया है, जिनकी रिपोर्ट का अब भी इंतजार है।
2023 से 2025 के बीच पदस्थ तहसीलदार और एसडीएम निशाने पर
पुलिस सूत्रों के अनुसार, वर्ष 2023 से 2025 के दौरान बिलासपुर में पदस्थ रहे सभी तहसीलदार जांच के दायरे में आ गए हैं। जांच में यह सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि कम से कम आठ मामलों में आवेदक और वास्तविक हितग्राही की अनुपस्थिति के बावजूद मुआवजे की राशि जारी कर दी गई थी। इस पूरे खेल में एक तत्कालीन एसडीएम की भूमिका की भी सूक्ष्मता से जांच की जा रही है।