
राज्य ब्यूरो, रायपुर। प्रदेश में अवैध और जबरन मतांतरण की गतिविधियों पर पूर्ण विराम लगाने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने 'धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम 2026' के नियमों का राजपत्र में प्रकाशन कर दिया है। इसके साथ ही यह नया कानून राज्यभर में प्रभावी हो गया है। नया अधिनियम 1968 के पुराने छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम का स्थान लेगा। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की तर्ज पर अब छत्तीसगढ़ में भी मतांतरण विरोधी कानून को बेहद कड़ा रूप दिया गया है।
उल्लेखनीय है कि इस विधेयक को 19 मार्च 2026 को छत्तीसगढ़ विधानसभा से मंजूरी मिली थी, जिसके बाद 8 अप्रैल को राज्यपाल ने इस पर अपने हस्ताक्षर किए। कानून की मूल अधिसूचना 10 जुलाई 2026 को जारी हुई थी, जबकि इसके विस्तृत नियमों को 4 अगस्त 2026 को राजपत्र में प्रकाशित किया गया है।
नए प्रावधानों के तहत यदि कोई धर्मगुरु या व्यक्ति अंतरधार्मिक विवाह कराता है, तो उसे समारोह से कम से कम 8 दिन पूर्व सक्षम प्राधिकारी को घोषणापत्र देना अनिवार्य होगा। जांच में यदि शादी का मुख्य उद्देश्य केवल मतांतरण पाया गया, तो विवाह को अवैध घोषित कर दिया जाएगा।
इसके अतिरिक्त, स्वैच्छिक मतांतरण के लिए व्यक्ति को प्राधिकृत अधिकारी के पास आवेदन देना होगा, जिसकी सूचना स्थानीय पंचायत और थाने के बोर्ड पर 30 दिनों के दावे-आपत्तियों के लिए लगाई जाएगी। आवेदन के 90 दिनों के भीतर प्रक्रिया पूरी न होने पर वह स्वतः निरस्त माना जाएगा। हालांकि, अपने मूल पैतृक धर्म में वापसी (घर वापसी) को मतांतरण की श्रेणी में नहीं रखा गया है।
तेज सुनवाई के लिए हर जिले में विशेष न्यायालय गठित किए जाएंगे। उप-मुख्यमंत्री व गृह मंत्री विजय शर्मा ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार अवैध गतिविधियों को कतई बर्दाश्त नहीं करेगी और कानून का कड़ाई से पालन कराएगी।