छत्तीसगढ़ की जांबाज IPS मल्लिका बनर्जी, जानें कैसे 'सेल्सवुमन' बन ढहाया तस्करी का किला
भारत दुनिया के उन देशों में से है, जहां अपराध से जुड़ी ज्यादातर घटना या तो दबा दी जाती हैं या फिर बाहर आ ही नहीं पातीं। हालांकि, कुछ ऐसे मामले भी सामन ...और पढ़ें
Publish Date: Mon, 02 Feb 2026 10:45:43 AM (IST)Updated Date: Mon, 02 Feb 2026 10:45:43 AM (IST)
पुलिस की जांबाजी की कहानी( सांकेतिक फोटो) डिजिटल डेस्क। भारत दुनिया के उन देशों में से है, जहां अपराध से जुड़ी ज्यादातर घटना या तो दबा दी जाती हैं या फिर बाहर आ ही नहीं पातीं। हालांकि, कुछ ऐसे मामले भी सामने आते हैं, जिनकी पूरी कहानी सोचने पर मजबूर कर देती है कि एक अफसर कैसे पूरे सिस्टम का सीना गर्व से चौड़ा कर देता है। ऐसी ही कहानी आईपीएस अफसर Mallika Banerjee की है, जिन्होंने कुछ ऐसा किया, जिसने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया। आइए आपको पूरी कहानी बताते हैं।
घर-घर सेल्सवुमन बनकर शुरू हुआ मिशन
2016 में छत्तीसगढ़ में तैनाती के दौरान आईपीएस अधिकारी मल्लिका बनर्जी ने एक असामान्य लेकिन निर्णायक कदम उठाया। बच्चों के अचानक “नौकरी” के नाम पर गायब होने के मामलों में पारंपरिक पुलिसिंग नाकाम साबित हो रही थी। शिकायतें अधूरी रहती थीं और परिवार डर के कारण पीछे हट जाते थे। इस स्थिति को समझने के लिए बनर्जी ने वर्दी उतारकर एक साधारण डोर-टू-डोर सेल्सवुमन के रूप में गांव-गांव घूमना शुरू किया।
25 अवैध एजेंसियों का पर्दाफाश हुआ
इस अंडरकवर मिशन के दौरान उन्होंने पाया कि फर्जी प्लेसमेंट एजेंसियां गरीबी का फायदा उठाकर बच्चों को रोजगार का सपना दिखा रही थीं, जो आगे चलकर जबरन श्रम और शोषण में बदल जाता था। जांच के बाद करीब 25 अवैध एजेंसियों का पर्दाफाश हुआ और 20 से अधिक बच्चों को मुक्त कराया गया। यह कोई फिल्मी कहानी नहीं थी, बल्कि शांत और व्यवस्थित पुलिस कार्रवाई थी, जिसने दिखाया कि मानव तस्करी कितनी सामान्य शक्ल में मौजूद रहती है।
देशभर में दिख रहा है पैटर्न
आज वही पैटर्न देशभर में देखने को मिल रहा है। गुजरात, झारखंड, कोलकाता और दिल्ली में हालिया कार्रवाइयों के दौरान नवजात से लेकर 12 साल तक के बच्चों को तस्करी से बचाया गया। C-LAB की रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल 2024 से मार्च 2025 के बीच 53,651 बच्चों को रेस्क्यू किया गया और 38,000 से अधिक एफआईआर दर्ज हुईं। सुप्रीम कोर्ट भी इसे गंभीर संकट मानते हुए सख्त निगरानी की बात कह चुका है। आंकड़े डरावने हैं, लेकिन असली चुनौती बच्चों के पुनर्वास और सुरक्षित भविष्य की है।