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छत्तीसगढ़ में रूफटॉप सोलर बिजली खरीद दर में कटौती, उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ेगा सीधा असर

वित्त वर्ष 2025-26 के लिए खरीद दर 2.50 रुपये प्रति यूनिट और वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 1.94 रुपये प्रति यूनिट निर्धारित की गई है। यानी अगले वित्त वर्ष ...और पढ़ें

By Satish PandeyEdited By: Mohan Kumar
Publish Date: Fri, 10 Jul 2026 09:01:09 AM (IST)Updated Date: Fri, 10 Jul 2026 09:02:36 AM (IST)
छत्तीसगढ़ में रूफटॉप सोलर बिजली खरीद दर में कटौती, उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ेगा सीधा असर
रूफटॉप सोलर बिजली खरीद दर में कटौती (AI से जनरेट इमेज)

HighLights

  1. रूफटॉप सोलर बिजली खरीद दर में कटौती
  2. नए वित्त वर्ष से मिलेगा 22 प्रतिशत कम भुगतान
  3. विद्युत नियामक आयोग ने जारी किया आदेश

राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, रायपुर। छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत नियामक आयोग (सीएसइआरसी) ने रूफ टॉप सोलर (आरटीएस) से उत्पादित अतिरिक्त बिजली की खरीद के लिए नई दरें तय कर दी हैं। आयोग के आदेश के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 के लिए खरीद दर 2.50 रुपये प्रति यूनिट और वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 1.94 रुपये प्रति यूनिट निर्धारित की गई है। यानी अगले वित्त वर्ष से सोलर उपभोक्ताओं को अतिरिक्त बिजली पर करीब 22.4 प्रतिशत कम भुगतान मिलेगा।

उपभोक्ताओं को लगा झटका

इस फैसले से रूफ टॉप सोलर प्लांट लगाने वाले उपभोक्ताओ को झटका लगा है। विद्युत नियामक आयोग ने यह आदेश डीआरई (डिस्ट्रीब्यूटेड रिन्यूएबल एनर्जी) विनियमो के प्रविधानों तथा राज्य विद्युत वितरण कंपनी से प्राप्त जानकारी के आधार पर जारी किया है।


यह दरें रूफ टॉप सोलर उपभोक्ताओ द्वारा ग्रिड में दी जाने वाली अतिरिक्त बिजली के निपटान (सेटलमेंट) पर लागू होगी। आदेश के अनुसार, नई दरों का उद्देश्य मौजूदा नियामकीय प्रविधानों के अनुरूप रूफ टॉप सोलर प्रणाली के लिए एक समान और पारदर्शी भुगतान व्यवस्था सुनिश्चित करना है।

हालांकि, पहले की तुलना मे दरें कम होने से अतिरिक्त बिजली बेचने पर उपभोक्ताओं को मिलने वाली राशि प्रभावित हो सकती है। ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े हितधारकों की नजर अब इस बात पर है कि नई दरों का रूफ टॉप सोलर परियोजनाओं और उपभोक्ताओं की निवेश योजनाओं पर क्या असर पड़ता है।

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समझिए, कैसे होता है नेट मीटरिंग का हिसाब

बिजली वितरण कंपनी के अधिकारियों ने बताया कि नेट मीटरिंग व्यवस्था के तहत सोलर संयंत्र से उत्पादित बिजली का पहले उपभोक्ता की मासिक खपत में समायोजन किया जाता है। इसके बाद यदि बिजली बचती है और ग्रिड में जाती है, तो उसकी यूनिट हर महीने उपभोक्ता के खाते में जुड़ती रहती है। वित्तीय वर्ष के अंत में खाते में बची सभी अतिरिक्त यूनिट का नियमानुसार बायबैक किया जाता है।

इसकी राशि निर्धारित दर के अनुसार उपभोक्ता के खाते में जमा कर आगामी बिजली बिलों में समायोजित की जाती है। प्रत्येक नए वित्तीय वर्ष में यूनिट का लेखा-जोखा नए सिरे से शुरू होता है। इसलिए पिछले वित्तीय वर्ष की अतिरिक्त यूनिट नए बिजली बिल में यूनिट के रूप में दिखाई नहीं देती। उसका मूल्य उपभोक्ता के खाते में सुरक्षित रहता है और नियमानुसार आगामी बिजली बिलों में क्रेडिट के रूप में समायोजित किया जाता है।