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निजी जमीन पर बिना अनुमति सड़क निर्माण कर दशकों तक मुआवजा नहीं देने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार को लगाई कड़ी फटकार

निजी जमीन पर बिना अनुमति सड़क निर्माण कर दशकों तक मुआवजा नहीं देने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार को कड़ी फटकार लगाई है।

By Digital DeskEdited By: manoj dubey
Publish Date: Mon, 22 Jun 2026 06:39:24 PM (IST)Updated Date: Mon, 22 Jun 2026 07:01:03 PM (IST)
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निजी जमीन पर बिना अनुमति सड़क निर्माण कर दशकों तक मुआवजा नहीं देने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार को लगाई कड़ी फटकार

HighLights

  1. वर्ष 1986 में बिना अनुमति बना दी गई थी सड़क
  2. 40 वर्षों के संघर्ष के बाद भूमि मालिकों को राहत मिली
  3. कब्जे के 24 साल बाद शुरू हुई अधिग्रहण प्रक्रिया

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। निजी जमीन पर बिना अनुमति सड़क निर्माण कर दशकों तक मुआवजा नहीं देने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार की याचिका खारिज करते हुए उस पर दो लाख रुपये का जुर्माना लगाया और यह राशि आठ सप्ताह के भीतर प्रभावित भूमि मालिकों को देने का निर्देश दिया।

करीब 40 वर्षों तक न्याय के लिए संघर्ष करने के बाद भूमि मालिकों को आखिरकार राहत मिली। अदालत ने स्पष्ट कहा कि सरकार ने निजी संपत्ति पर अनधिकृत कब्जा किया और लंबे समय तक उसका उपयोग करने के बावजूद उचित मुआवजा नहीं दिया।


1986 में बिना अनुमति बना दी गई सड़क

मामले की शुरुआत वर्ष 1986 में हुई, जब लोक निर्माण विभाग (PWD) ने एक निजी भूमि पर सड़क का निर्माण कर दिया। आरोप है कि जमीन मालिकों से न तो अनुमति ली गई और न ही उन्हें कोई मुआवजा दिया गया। बाद में सीमांकन प्रक्रिया के दौरान यह तथ्य सामने आया कि सड़क निजी भूमि पर बनाई गई है। इसके बाद भूमि मालिकों ने वर्ष 2006 में अदालत का रुख करते हुए विभाग को जमीन से हटाने और अपने अधिकारों की रक्षा की मांग की।

कब्जे के 24 साल बाद शुरू हुई अधिग्रहण प्रक्रिया

भूमि मालिकों द्वारा मुकदमा दायर किए जाने के बाद राज्य सरकार ने वर्ष 2010 में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की। यानी जिस जमीन पर 1986 में सड़क बनाई गई थी, उसके लिए अधिग्रहण की कार्रवाई लगभग 24 साल बाद की गई।

जून 2011 में भूमि अधिग्रहण अधिकारी ने अंतिम अवॉर्ड जारी करते हुए जमीन का मूल्य 4,308 रुपये प्रति वर्ग मीटर निर्धारित किया। हालांकि भूमि मालिकों ने इस मूल्यांकन को अपर्याप्त बताते हुए चुनौती दी।

मुआवजा बढ़ा, ब्याज देने का भी आदेश

मामला रेफरेंस कोर्ट पहुंचा, जहां मुआवजे की दर बढ़ाकर 5,380 रुपये प्रति वर्ग मीटर कर दी गई। इसके बाद दोनों पक्ष छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट पहुंचे। हाई कोर्ट ने रेफरेंस कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए राज्य सरकार को वर्ष 2006 से ब्याज देने का निर्देश दिया। अदालत ने पहले वर्ष के लिए 9 प्रतिशत और उसके बाद भुगतान होने तक 15 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का आदेश दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की दलीलें खारिज कीं

राज्य सरकार ने हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने याचिका को खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि राज्य ने भूमि मालिकों की संपत्ति पर अनधिकृत कब्जा किया और वर्षों तक उसका उपयोग करता रहा। इसके बावजूद प्रभावित लोगों को समय पर मुआवजा नहीं दिया गया। ऐसे में हाई कोर्ट द्वारा ब्याज देने का आदेश पूरी तरह न्यायोचित है।

अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि राज्य सरकार की अपील से ऐसा प्रतीत होता है कि वह पहले से पीड़ित भूमि मालिकों को और अधिक मुकदमेबाजी में उलझाना चाहती है, जबकि निचली अदालतों के निष्कर्ष तथ्यात्मक और कानूनी रूप से सही हैं।

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सरकार पर 2 लाख रुपये का जुर्माना

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की याचिका को पूरी तरह निराधार बताते हुए उस पर 2 लाख रुपये की लागत (कॉस्ट) लगाई। अदालत ने निर्देश दिया कि यह राशि आठ सप्ताह के भीतर भूमि मालिकों को भुगतान की जाए। इस फैसले को निजी संपत्ति के अधिकार और भूमि मालिकों को समय पर उचित मुआवजा सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।