
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर : एजुकेशन हब में तबदील हो चुके इंदौर अब उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक नई चुनौती का सामना कर रहा है। देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के दायरे में आने वाले प्राइवेट कालेजों में लगातार प्रवेश की संख्या कम होने लगी है। अब हायर एजुकेशन के लिए विद्यार्थियों का रुख बड़े शहरों की तरफ होने लगा है।
इसके पीछे कई कारण सामने आए है, जिसमें पाठ्यक्रम पूरा होने के बावजूद प्लेसमेंट नहीं होना है। यहां तक कि परीक्षा परिणाम भी लगातार गिरने लगा है। निजी कॉलेजों में कोड 28 में नियुक्त शिक्षकों की कमी बनी है। जबकि सरकारी कॉलेजों में अतिथि शिक्षकों से विद्यार्थियों को पढ़ाया जा रहा है।
शिक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक विद्यार्थियों का इंदौर की बजाए दिल्ली, पुणे, बेंगलुरु, मुंबई, हैदराबाद और अहमदाबाद जैसे बड़े शहरों के कालेजों को प्राथमिकता देना है। तीन महीने काउंसिलिंग चलने के बावजूद निजी कालेजों में 27 फीसद सीटें खाली है।
कुछ वर्ष पहले तक सिर्फ इंदौर के छात्र ही बेहतर शिक्षा और करियर के लिए मेट्रो शहरों का रुख करते थे। वहीं धार, खरगोन, खंडवा, बुरहानपुर, झाबुआ, बदनावर और आसपास के जिलों के अधिकांश विद्यार्थी उच्च शिक्षा के लिए इंदौर को ही पहली पसंद मानते थे। लेकिन पिछले दो-तीन वर्षों में यह स्थिति तेजी से बदली है।
शिक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों के मुताबिक वर्तमान में ऐसे करीब 30 से 35 प्रतिशत विद्यार्थी है, जो पहले निजी कालेजों में प्रवेश लेते थे। अब दूसरे राज्यों के बड़े शहरों में पढ़ाई के लिए जा रहे हैं। यदि यही रुझान जारी रहा तो अगले कुछ वर्षों में यह आंकड़ा 40 से 45 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। इस पलायन का सबसे बड़ा कारण राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) का प्रदेश में अधूरा और असंगत क्रियान्वयन है।
वार्षिक परीक्षा सिर्फ पारंपरिक पाठ्यक्रमों तक सीमित नहीं है। बल्कि बीबीए और बीसीए कोर्स भी प्रदेश में वार्षिक प्रणाली से संचालित किए जा रहे हैं। अशासकीय महाविद्यालय प्राचार्य संघ ने एआईसीटीई को पत्र लिखकर प्रोफेशनल कोर्सों में सेमेस्टर प्रणाली लागू करने की मांग की है।
प्रदेशभर में सरकारी कॉलेजों की संख्या 569 तक पहुंच गई है। पिछले पांच साल में 18 फीसद कालेज बढ गए है। जबकि दो हजार से ज्यादा निजी कालेज है। स्नातक पाठ्यक्रम में आठ से नौ लाख और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम की साढ़े चार लाख सीटें है, जिसमें सरकारी कॉलेजों से संचालित 200 कोर्स की साढ़े पांच लाख सीटें है। वहीं दो हजार कालेजों में साढ़े तीन लाख सीटे है।
अकेले डीएवीवी के दायरे में आने वाले कालेजों में स्नातक की ढ़ाई लाख सीटें है। मई से जुलाई के बीच काउंसिलिंग की गई। सरकारी कॉलेजों में 90 फीसद प्रवेश हो चुके है। वहीं निजी कॉलेजों में अभी 25 से 27 फीसद सीटें खाली है। वहीं निजी कॉलेजों में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम की सीटें बेहद कम है। अधिकांश कॉलेजों में एमबीए, एमएसडब्ल्यू, एलएलबी व एलएलएम रखे गए हैं।
अशासकीय महाविद्यालय प्राचार्य संघ के अध्यक्ष डा. सौरभ पारीख का कहना है कि यदि जल्द आवश्यक सुधार नहीं किए गए तो निजी कालेजों में प्रवेश लगातार घटते जाएंगे। इससे कई संस्थानों की आर्थिक स्थिति कमजोर होगी, नए पाठ्यक्रम शुरू करना मुश्किल हो जाएगा और शिक्षकों के रोजगार पर भी असर पड़ सकता है।