
नईदुनिया मनोरंजन डेस्क । संस्कारधानी के शिक्षा के मंदिरों द्वारा एक जमाने में बाल फिल्में दिखाने का आयोजन होता था। इसके लिए पूरा सिनेमा हाल बुक करा लिया जाता था। दरअसल, विद्यार्थियों के अध्यापन और संस्कार के साथ-साथ शालेय स्तर में कई गतिविधियां आयोजित होती है।
खेलकूद गतिविधियां, सांस्कृतिक गतिविधियों और अन्य गतिविधियां जिसमें साल के सामूहिक रूप से बाल फिल्मों को दिखाना या शाला में मैजिक शो या कठपुतली की प्रस्तुति करकर विद्यार्थियों का भरपूर मनोरंजन करना।
जब हम विद्यालय में अध्यनरत रहे उस समय विद्यालय के माध्यम से प्रतिवर्ष जबलपुर के अनेक छविगृह में शनिवार के दिन बाल फिल्म दिखाई जाती थी जो हमेशा करमुक्त रहती थी इन फिल्मों को बनाने का मुख्य उद्देश्य मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञानवर्धक बातों को भी प्रसारित करना था।
जब स्कूल के सारे विद्यार्थी मिलकर एक साथ फिल्में देखने के लिए सिनेमाघर जाते थे, तब सभी स्कूल के सहपाठीगण अपने एक मित्र के यहां एकत्र हो जाते थे और उस समय साधन के अभाव होने के कारण आपस में सभी मिलजुल कर पैसे एकत्रित करकर रिक्शा के माध्यम से सिनेमा घर पहुंचते थे।
कभी-कभी रिक्शा में आवश्यकता से भी अधिक हम सभी विद्यार्थी बैठ जाते थे ऐसी स्थिति में रिक्शा वालों को थोड़ा सा ज्यादा पैसा देकर कहीं रिक्शा के पीछे या रिक्शा चालक की सीट के आगे बैठकर मस्ती करते हुए छविगृह पहुंचते थे तब के ऐसे अनेक यादगार पल आज भी हमारे जीवन मैं सम्मिलित हो गए हैं।
छविगृह में कतार के साथ खड़े होकर जब गेटकीपर सभी विद्यार्थियों की सिनेमा की टिकट की जांच करता था तब पीछे से अनेक विद्यार्थी एक दूसरे के साथ धक्कामुक्की करते थे जिससे आगे से धक्कामुक्की नहीं करने की लिए आगे लगे हुए कतार में विद्यार्थी आवाज लगते थे फिल्म के मध्यांतर में जब ब्रेक होता था।
अमित परनामी, लेखक एंकर व अभिनेता हैं
सभी विद्यार्थी पुनः पैसे इकट्ठे करकर अलग-अलग खाने के व्यंजन खरीदते थे और फिर सभी मिलजुलकर एक दूसरे के व्यंजन से थोड़ा-थोड़ा स्वाद भी लेते थे। कुछ मित्र अपने साथ लंच और पानी की बोतल भी लेकर आते थे यही सुनहरे दिन स्कूल के कभी हमारे जीवन से ओझल नहीं हो सकतें।
कभी-कभी स्कूल में मैजिक शो का भी आयोजन किया जाता था क्योंकि विद्यार्थियों की संख्या अधिक होने के कारण दो-तीन दिन तक लगातार मैजिक शो वाले आकर अपने कार्यक्रम कक्षावार दिखते थे और उस समय भी मैजिक शो में कभी-कभी ऐसी प्रस्तुतियां दिखाई जाती थी जिससे हंसी थमने का नाम भी नहीं लेती थी।
स्कूल में कठपुतली के आयोजन भी होते थे और कठपुतली दिखाने वाले जब दूसरे राज्य से आते थे तो उनके परिधान भी उस राज्य के अनुरूप होते थे इसके साथ-साथ कई बार स्कूल में बाहर से कुछ ऐसे लोग भी आते थे जो विभिन्न प्रकार कि शैक्षणिक सामग्रियों का विक्रय भी करते थे और उनका उपयोग किस प्रकार किया जाए।
ऐसी किताबें जिसे हम आसानी से सीख सके उसे खरीदने के लिए अगले दिन घर से पैसे लेकर आते थे ऐसे स्वर्णिम अद्भुत पल अब हमसे दूर हो रहे हैं इसका प्रमुख कारण यह है कि आज आधुनिक तकनीकी युग आ चुका है और आज की नवोदित पीढ़ी इंटरनेट के माध्यम से अच्छा-खासा लगाव हो गया है।
क्योंकि आधुनिक परिवेश में नई तकनीकी विधि से हर कुछ आसानी से सीखा और समझा जा सकता है लेकिन जब कंप्यूटर और इंटरनेट का समय नहीं था तब मनोरंजन के सीमित साधनों से भी हम अपने खुशनुमा पल को अपने जीवन में आज भी संजोए कर रखे हुए हैं जो हमारे बचपन की अनमोल पूंजी है।
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