
लाइफस्टाइल डेस्क, नईदुनिया। बिलासपुर का सदर बाजार केवल खरीदारी का केंद्र नहीं, बल्कि शहर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान भी माना जाता है। करीब 300 वर्ष पुराने इस बाजार की गलियों में आज भी विरासत, व्यापार और अपनापन एक साथ दिखाई देता है।
गर्मी के दिनों में दिनभर की तपिश के बाद जैसे ही शाम ढलती है, पूरा बाजार रोशनी और चहल-पहल से जगमगा उठता है। लोगों की आवाजाही, पुराने प्रतिष्ठानों की खुशबू और ठंडी मिठाइयों का स्वाद यहां के माहौल को खास बना देता है।
स्थानीय लोगों के अनुसार सदर बाजार का इतिहास शहर के पुराने सामाजिक और व्यापारिक ताने-बाने से जुड़ा हुआ है। यह क्षेत्र पहले कान्यकुब्ज ब्राह्मण समाज की बस्ती माना जाता था, जबकि दूसरी ओर बोहरा मुस्लिम समाज निवास करता था। समय के साथ यह इलाका व्यापारिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया।
भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद आए पंजाबी और सिंधी परिवारों को भी यहां दुकानें दी गईं। इसके बाद बाजार की रौनक और व्यापार दोनों तेजी से बढ़े। आज भी कई परिवार अपने लगभग 200 वर्ष पुराने मकानों और दुकानों के साथ यहां की परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।
सदर बाजार में वर्तमान में 250 से अधिक दुकानें संचालित हैं। यहां कपड़ा, सराफा, स्टील, मिठाई और पारंपरिक खानपान की दुकानें विशेष पहचान रखती हैं। संतोष भुवन का नाश्ता, अमरनाथ की आयुर्वेदिक दुकान, ब्रजवासी और पुरानी मिठाई दुकानों का स्वाद आज भी लोगों को आकर्षित करता है।
गर्मी के मौसम में शाम होते ही लोग यहां खरीदारी के साथ ठंडी लस्सी, जलेबी और पुराने स्वाद का आनंद लेने पहुंचते हैं। त्योहारों और उत्सवों के दौरान बाजार में भारी भीड़ रहती है, लेकिन सामान्य दिनों में भी इसकी चमक शहर की धड़कन जैसी महसूस होती है।
सदर बाजार केवल व्यापार का केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द और विरासत का प्रतीक भी माना जाता है। यहां कपड़ा, सराफा और स्टील की लगभग 55 प्रतिशत दुकानें संचालित होती हैं। पुराने मंदिर और वर्षों पुरानी मिठाई एवं नाश्ते की दुकानें इसकी ऐतिहासिक पहचान को मजबूत बनाती हैं।
बाजार के व्यापारी स्वच्छता, पारदर्शिता, पर्यावरण संरक्षण और सुरक्षा को लेकर भी लगातार जागरूकता बढ़ा रहे हैं। यही कारण है कि सदर बाजार अपनी ऐतिहासिक छवि को बनाए रखते हुए आधुनिकता के साथ आगे बढ़ता नजर आता है।