
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। गणेशोत्सव आस्था और उत्सव का पर्व है, लेकिन प्रतिमा निर्माण से लेकर विसर्जन तक पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी भी इससे जुड़ी है। हर वर्ष प्रशासन, नगर निगम और प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े विभागों की ओर से प्रतिमा निर्माण, रंगों के उपयोग और विसर्जन को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए जाते हैं। सवाल यह है कि इन नियमों का पालन कागजों और बैठकों से आगे जमीन पर कितना दिखाई देता है?
नईदुनिया के सात दिवसीय अभियान माटी के गणेश के पांचवें दिन की पड़ताल इसी सवाल पर केंद्रित है। प्रतिमा बनाने वाले कारीगर, विक्रेता, पूजा समितियां, श्रद्धालु और प्रशासन-सभी की भूमिका इस बात से जुड़ी है कि गणेशोत्सव के बाद शहर के तालाबों, नदियों और अन्य जलस्रोतों की स्थिति कैसी रहेगी।
पर्यावरण संरक्षण का सवाल केवल विसर्जन के दिन शुरू नहीं होता। प्रतिमा किस सामग्री से बनाई जा रही है, उस पर कौन से रंग लगाए जा रहे हैं और सजावट में किन वस्तुओं का उपयोग हो रहा है, यह सब पहले ही तय कर देता है कि विसर्जन के बाद उसका प्रभाव कितना होगा।
पर्यावरण संरक्षण के लिए लंबे समय से प्राकृतिक और कम प्रदूषणकारी सामग्री के उपयोग को बढ़ावा देने की बात की जाती रही है। मिट्टी से बनी प्रतिमाओं को प्राथमिकता, कम प्रदूषणकारी रंगों का उपयोग और गैर-जैविक सजावट को कम करना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
प्रतिमा निर्माण से जुड़े लोगों के लिए चुनौती यह भी है कि पर्यावरण अनुकूल विकल्प बाजार में आकर्षक और प्रतिस्पर्धी बने रहें। इसलिए केवल प्रतिबंध या दिशा-निर्देश पर्याप्त नहीं हैं। कारीगरों को विकल्प, प्रशिक्षण और बाजार उपलब्ध कराना भी उतना ही जरूरी है।

गणेशोत्सव के बाद एक साथ बड़ी संख्या में प्रतिमाओं के विसर्जन की चुनौती सामने आती है। इसके लिए प्रशासन और नगर निगम की ओर से विसर्जन स्थलों की व्यवस्था की जाती है। कृत्रिम कुंडों और निर्धारित स्थानों का उद्देश्य प्राकृतिक जलस्रोतों पर पड़ने वाले दबाव को कम करना होता है।
श्रद्धालुओं की भूमिका यहां सबसे महत्वपूर्ण है। यदि निर्धारित व्यवस्था के बावजूद प्रतिमाओं और पूजा सामग्री को सीधे नदी या तालाब में विसर्जित किया जाता है तो पर्यावरण संरक्षण की पूरी कोशिश कमजोर पड़ जाती है।

गणेशोत्सव के दौरान प्रतिमा के साथ बड़ी मात्रा में फूल, माला, कपड़ा, प्लास्टिक, पैकेजिंग और अन्य पूजा सामग्री भी जलस्रोतों में पहुंच जाती है। कई बार चर्चा केवल प्रतिमा की सामग्री तक सीमित रह जाती है, जबकि निर्माल्य और अन्य कचरे का उचित प्रबंधन भी उतना ही आवश्यक है।
फूल और जैविक सामग्री को अलग एकत्र कर खाद बनाने जैसी व्यवस्था की जा सकती है। प्लास्टिक और अन्य गैर-जैविक सामग्री को सामान्य ठोस कचरे से अलग करना होगा। विसर्जन स्थलों पर इस प्रकार की व्यवस्था जितनी बेहतर होगी, जलस्रोतों पर दबाव उतना कम किया जा सकेगा।

अक्सर पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी केवल प्रशासन पर डाल दी जाती है। लेकिन गणेशोत्सव में हजारों परिवार, पूजा समितियां, कारीगर और व्यापारी शामिल होते हैं। इसलिए नियमों का पालन भी सामूहिक जिम्मेदारी है।
प्रशासन को समय पर स्पष्ट दिशा-निर्देश, पर्याप्त विसर्जन व्यवस्था और निगरानी करनी होगी। कारीगरों और विक्रेताओं को पर्यावरण अनुकूल विकल्पों को बढ़ावा देना होगा। वहीं नागरिकों को प्रतिमा खरीदने और विसर्जन के दौरान जिम्मेदार व्यवहार अपनाना होगा।

किसी भी नियम का पालन तब बेहतर होता है, जब उसके पीछे का उद्देश्य समझ में आता है। केवल यह कह देना कि किसी सामग्री का उपयोग न करें, पर्याप्त नहीं है। लोगों को यह भी समझाना होगा कि उसका जलस्रोतों, जलीय जीवन और शहर के पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।
इसीलिए गणेशोत्सव से पहले लगातार जागरूकता : अभियान चलाने की जरूरत है। स्कूलों, कालेजों, बाजारों, धार्मिक संस्थाओं और सामाजिक संगठनों को इसमें भागीदार बनाया जा सकता है।

बैठकों में पर्यावरण संरक्षण पर चर्चा और दिशा-निर्देश जारी करना पहला कदम है। असली परीक्षा गणेशोत्सव के दौरान और विशेष रूप से विसर्जन के दिन होती है। क्या बाजार में पर्यावरण अनुकूल प्रतिमाएं आसानी से उपलब्ध हैं। क्या निर्धारित विसर्जन स्थल पर्याप्त हैं? क्या वहां कचरे को अलग करने की व्यवस्था है और क्या नागरिकों को इसकी जानकारी समय पर मिल रही है। इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि नियमों का पालन वास्तव में हो रहा है या पर्यावरण संरक्षण केवल औपचारिक अपील बनकर रह गया है।
नईदुनिया के अभियान का उद्देश्य किसी की आस्था पर सवाल उठाना नहीं, बल्कि आस्था के उत्सव को प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी से जोड़ना है। गणपति विघ्नहर्ता हैं और प्रकृति की रक्षा का संकल्प भी हमारे सामने आने वाले पर्यावरणीय संकटों को कम करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम हो सकता है।
नगर निगम विसर्जन स्थलों, कृत्रिम कुंडों और कचरा प्रबंधन की व्यवस्था करे। कारीगर और विक्रेता पर्यावरण अनुकूल प्रतिमाओं के विकल्प बढ़ाएं। - स्वामी अखिलेश्वरानंद महाराज, महामंडलेश्वर
वर्जन....पूजा समितियां जिम्मेदार प्रतिमा चयन और निर्धारित विसर्जन व्यवस्था का पालन करें। नागरिक मिट्टी की प्रतिमा को प्राथमिकता और पूजा सामग्री को जलस्रोतों में न डालने के नियम का पालन सुनिश्चित करें। - स्वामी डा. मुकुंददास महाराज, श्री गुप्तेश्वर पीठ