मनोज दुबे। मध्य प्रदेश की ऐतिहासिक धड़कनों को सुनना हो तो ग्वालियर किले के विशाल परकोटे के पीछे नजर डालिए। वहीं चुपचाप, सूरज की रोशनी में दमकती हुई खड़ी है गोपाचल हिल। यह सिर्फ एक पहाड़ी नहीं, जैन कला, आस्था और भारतीय इतिहास के हजारों साल पुराने धागों से बुनी एक जीवित दास्तान है।
यहां पहुंचते ही सबसे पहले जिस चीज का अहसास होता है, वह है पत्थर की उन चट्टानों में कैद समय की धीमी, मगर गहरी सांसें। गुफाओं के भीतर घुसते ही लगता है जैसे किसी गुप्त सभा में आ गए हों।
पहाड़ी की सीढ़ियां चढ़ते ही हवा बदल जाती है। हल्की, शांत, किसी पुराने मंदिर की तरह। ऐसा लगता है जैसे पत्थर खुद सांस ले रहे हों। हर तरफ फैली गुफाएं, काई से ढके पुराने रास्ते और अचानक सामने खड़ी विशाल मूर्तियां…सब मिलकर बताते हैं कि यहां समय कभी गुजरा ही नहीं, बस टिककर बैठ गया है।
...तब इन चट्टानों ने पहली बार हथौड़े की आवाज सुनी थी
कहते हैं, 7वीं से 15वीं सदी के बीच तोमर राजाओं के राज में, जब राजा डूंगर सिंह और कीर्ति सिंह कला और आस्था को एक ही दीपक में जलाया करते थे, तब इन चट्टानों ने पहली बार हथौड़े की आवाज सुनी थी। और फिर कई पीढ़ियों तक कारीगर इन खुरदुरी दीवारों में जान फूंकते रहे।
करीब 100 गुफाएं और अनगिनत जैन तीर्थंकरों की मूर्तियां
7वीं से 15वीं सदी के बीच ग्वालियर के तोमर राजाओं खासतौर पर राजा डूंगर सिंह और राजा कीर्ति सिंह के समय में गढ़ी गईं ये विशालकाय मूर्तियां सिर्फ धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि कारीगरों की कला और राजा की संरक्षण भावना की ऐसी साझेदारी का नतीजा हैं, जिसे देख आज भी मन ठहर जाता है।
करीब 100 गुफाएं और अनगिनत जैन तीर्थंकरों की मूर्तियां हर एक इतनी बारीक, इतनी संतुलित कि लगता है जैसे पत्थर नहीं, कोई शांत-शांत सांस लेता जीव खड़ा हो।
भगवान आदिनाथ की 57 फीट ऊंची मूर्ति
इनमें से सबसे प्रभावशाली है भगवान आदिनाथ की 57 फीट ऊंची मूर्ति। एक ही चट्टान से उकेरी गई, ध्यान में लीन, आकाश को छूती हुई। इसे दुनिया की सबसे बड़ी एकाश्म जैन मूर्तियों में गिना जाता है। पहाड़ी का आसमान जैसे उसके पैरों में आकर ठहर गया हो।
ठंडी हवा चेहरे से टकराती है और मन में यह खयाल उठता है कि इन मूर्तियों को बनाने वाले कारीगरों ने केवल पत्थर नहीं तराशा बल्कि उन्होंने किसी विश्वास की धड़कन को पकड़ा था और उसे आकार दे दिया था। इसके आस-पास भगवान पार्श्वनाथ और महावीर की मूर्तियां भी अपनी शांत गरिमा में इतिहास के गहरे पन्नों को खोलती नजर आती हैं।
जैन धर्म उस समय ग्वालियर में खूब फला-फूला
मूर्ति-शिल्प की बारीकियां गहनों की नोक, मुखमुद्राओं का संतुलन और हाथों की कोमलता बताती हैं कि इन कारीगरों ने सिर्फ पत्थर को नहीं काटा था, उन्होंने विश्वास को आकार दिया था। जैन धर्म उस समय ग्वालियर में खूब फला-फूला और उसके संयम, अहिंसा और शांति के सिद्धांत मानो इन चट्टानों में हमेशा के लिए दर्ज हो गए।
हर कहानी में एक तूफान भी होता है
जब मुगल बादशाह बाबर ने ग्वालियर पर हमला किया
लेकिन हर कहानी में एक तूफान भी होता है। वर्ष 1527 में जब मुगल बादशाह बाबर ने ग्वालियर पर हमला किया। उसकी फौजों ने कई मूर्तियों के चेहरे, हाथ-पैर तोड़ दिए। बाबर ने खुद बाबरनामा में दर्ज किया कि उसने इन मूर्तियों को गिराने का आदेश दिया था।
यह इतिहास का एक कड़वा पल है, पर कड़वाहट से ज्यादा बड़ी है उन मूर्तियों की वह खामोश ताकत, जिससे वे आज भी खड़ी हैं। अपूर्ण होते हुए भी वे पूर्ण प्रतीत होती हैं। जैसे किसी ने उनका मर्म छुआ ही न हो।
जैन समुदाय के लिए पवित्र तीर्थ है
आज गोपाचल हिल जैन समुदाय के लिए पवित्र तीर्थ है, लेकिन उससे भी बढ़कर यह भारत की सांस्कृतिक रीढ़ की एक मजबूत कड़ी है। पहाड़ी के ऊपर खड़े होकर जब ग्वालियर शहर दूर तक फैला दिखता है, तो पत्थरों की ठंडी सतह पर हाथ रखते ही मन में एक अजीब सी गर्माहट उठती है।
गुफाओं में घूमते हुए लगता है कि हर कदम आपको हजार साल पीछे ले जा रहा है। जहां हथौड़े की टंकार, भक्ति के भजन और हवा की सरसराहट साथ-साथ बहते थे। गोपाचल हिल आपको इतिहास पढ़ाती नहीं बल्कि उसे महसूस कराती है।
गोपाचल हिल इतिहास नहीं सुनाती, उसे महसूस करवाती है
पहाड़ी की चोटी पर पहुंचकर जब ग्वालियर शहर दूर तक फैलता हुआ दिखता है, तो पत्थर की ठंडी सतह पर हाथ रखते ही अजीब सी गर्माहट महसूस होती है। जैसे किसी बहुत पुराने मित्र ने धीरे से हथेली थाम ली हो। गुफाओं के भीतर कदमों की आहट भी धीमी हो जाती है। ऐसा लगता है जैसे हर कदम के साथ हम पीछे लौट रहे हों।
गोपाचल हिल इतिहास नहीं सुनाती, उसे महसूस करवाती है और जब आप लौटते हैं, तो यह एहसास साथ ले जाते हैं कि कुछ जगहों पर समय मरता नहीं…वह बस रूप बदलकर जीवित रहता है। इन पत्थरों में, इन मुस्कानों में और इन अनगिनत कहानियों में।
गोपालचल नाम की उत्पत्ति कैसे हुई?
गोपाचल पर्वत मध्य भारत के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। उपलब्ध साहित्यिक, पुरातात्त्विक एवं परंपरागत स्रोतों के आधार पर इसका विकास 7वीं से 15वीं शताब्दी ईस्वी के मध्य माना जाता है। प्रारंभिक काल, विशेषतः 7वीं शताब्दी तक यह पर्वत घने वनों से आच्छादित था तथा इसके शिखर पर स्थित समतल भू-भाग में प्राकृतिक घास के मैदान विद्यमान थे।
इस क्षेत्र का उपयोग स्थानीय पशुपालक समुदाय द्वारा गौ-चारण हेतु किया जाता था। इन पशुपालकों को 'ग्वाला' कहा जाता था। 'गौ' शब्द से ही 'गोपाचल' नाम की व्युत्पत्ति मानी जाती है, जिसका शाब्दिक अर्थ है-गायों का निवास अथवा चारण-क्षेत्र।
सूरज सेन शिकार के दौरान इस पर्वत क्षेत्र में आए
स्थानीय किंवदंतियों एवं ऐतिहासिक परंपराओं के अनुसार, 8वीं शताब्दी में स्थानीय शासक सूरज सेन शिकार के दौरान इस पर्वत क्षेत्र में आए। इसी क्रम में जल की खोज करते हुए वे संत ग्वालिपा की गुफा तक पहुंचे। संत ग्वालिपा द्वारा उपलब्ध कराए गए निकटवर्ती जलस्रोत के जल का सूरज सेन के स्वास्थ्य पर विशेष प्रभाव पड़ा।
इस नगर का नाम 'ग्वालियर' प्रचलन में आया
परंपरा के अनुसार, सूरज सेन कुष्ठ रोग से पीड़ित थे और इस जल के सेवन से उनके रोग में सुधार हुआ। इस चमत्कारी अनुभव के पश्चात संत ग्वालिपा के परामर्श एवं अनुरोध पर यहां एक दुर्ग का निर्माण कराया गया, जिसके चारों ओर क्रमशः एक नगरी का विकास हुआ। इसी संत के नाम पर इस नगर का नाम 'ग्वालियर' प्रचलन में आया।
इस ऐतिहासिक प्रक्रिया से स्पष्ट होता है कि 'गोपाचल' नाम 'ग्वालियर' नगर नाम से प्राचीन है। यद्यपि गोपाचल पर्वत से संबद्ध प्रमुख शैलकृत मूर्तिकला का काल अपेक्षाकृत उत्तरवर्ती है और इसका उत्कर्ष 15वीं शताब्दी में तोमर वंश के शासनकाल के दौरान हुआ।
'गोपागिरि' और 'गोपाद्रि' का भी उल्लेख मिलता है
इतिहास एवं साहित्य में गोपाचल पर्वत के अन्य नामों जैसे 'गोपागिरि' और 'गोपाद्रि' का भी उल्लेख मिलता है, जिनका सामान्य अभिप्राय 'गायों से संबद्ध पर्वत' अथवा 'गौ-चारण भूमि' से है।
इसके अतिरिक्त, पुराणों में इस पर्वत का उल्लेख 'गोमंत' नाम से प्राप्त होता है, जो इसकी प्राचीनता एवं धार्मिक महत्व को रेखांकित करता है।
जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाओं का निर्माण शिलाओं को काटकर किया गया
इसी काल में जैन तीर्थंकरों की विशाल प्रतिमाओं का निर्माण पर्वत की शिलाओं को काटकर किया गया, जो तत्कालीन धार्मिक, कलात्मक एवं राजनीतिक संरक्षकता का प्रमाण प्रस्तुत करता है।