हार्ट अटैक, जिसे चिकित्सकीय भाषा में एक्यूट मायोकार्डियल इंफार्क्शन कहा जाता है, पहले बुज़ुर्गों की बीमारी मानी जाती थी। लेकिन हाल के वर्षों में 45 वर्ष से कम उम्र के युवाओं में हार्ट अटैक के मामले तेजी से बढ़े हैं। यह स्थिति न केवल स्वास्थ्य बल्कि सामाजिक और आर्थिक रूप से भी गंभीर प्रभाव डालती है।
युवाओं में हार्ट अटैक का कारण हमेशा दिल की नसों में लंबे समय से जमा चर्बी नहीं होता। धूम्रपान, मोटापा, असंतुलित आहार, शारीरिक निष्क्रियता, उच्च कोलेस्ट्राल, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और अत्यधिक शराब का सेवन प्रमुख जोखिम कारक हैं।
इसके अलावा मानसिक तनाव, नशीली दवाओं का सेवन, खून जमने की गड़बड़ी और कुछ आनुवंशिक कारण भी जिम्मेदार होते हैं। पुरुषों में इसका खतरा महिलाओं की तुलना में अधिक पाया गया है।
युवाओं में हार्ट अटैक के लक्षण अक्सर सामान्य नहीं होते। सीने में दर्द के बजाय पीठ दर्द, उल्टी, पसीना आना, सांस फूलना या अत्यधिक थकान महसूस हो सकती है।
इसी कारण कई बार सही समय पर पहचान नहीं हो पाती। समय पर इलाज न मिलने से जान का खतरा बढ़ जाता है। अटैक की पुष्टि ईसीजी, ट्रोपोनिन-I रक्त जांच और इकोकार्डियोग्राफी से की जाती है।
इलाज में दवाइयां, एंजियोग्राफी और जरूरत पड़ने पर तुरंत सर्जरी करना पड़ती है। इससे बचाव के लिए स्वस्थ जीवनशैली अपनाना, तनाव को नियंत्रित करना, तंबाकू और नशे से दूर रहना तथा नियमित स्वास्थ्य जांच करवाना बेहद जरूरी है।
नितिन मोदी, ह्रदय रोग विशेषज्ञ