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शिक्षक दिवस विशेष: राधाकृष्‍णन का जबलपुर से कनेक्‍शन और उनके जीवन के पहलू

प्रसिद्ध इतिहासकार एवं इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत के उपाध्यक्ष डा. आनंद सिंह राणा के अनुसार जबलपुर में शिक्षा के विकास में डा. राधाकृष्णन का यो...और पढ़ें

By Sunil dahiyaEdited By: Navodit Saktawat
Publish Date: Sat, 05 Sep 2026 11:19:20 AM (IST)Updated Date: Sat, 05 Sep 2026 11:20:30 AM (IST)
शिक्षक दिवस विशेष: राधाकृष्‍णन का जबलपुर से कनेक्‍शन और उनके जीवन के पहलू
डाॅ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन

HighLights

  1. संस्कारधानी की शिक्षा में राधाकृष्णन की अमिट छाप
  2. - विश्वविद्यालयों की परिकल्पना से प्रथम दीक्षा समारोह तक, जबलपुर से रहा गहरा नाता

सुरेन्द्र दुबे, जबलपुर। 5 सितंबर आते ही देश में शिक्षक दिवस की चर्चा होती है और भारत रत्न डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का व्यक्तित्व स्मरण हो उठता है। शिक्षक, दार्शनिक, शिक्षाविद, राजनयिक, उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति के रूप में उनकी अनेक पहचान हैं, लेकिन डा. राधाकृष्णन स्वयं को सबसे पहले शिक्षक मानते थे। संस्कारधानी जबलपुर के लिए उनका स्मरण इसलिए भी विशेष है कि इस शहर की उच्च शिक्षा के विकास और विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक यात्रा से उनका गहरा संबंध रहा है।

प्रसिद्ध इतिहासकार एवं इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत के उपाध्यक्ष डा. आनंद सिंह राणा के अनुसार जबलपुर में शिक्षा के विकास में डा. राधाकृष्णन का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। उनका जबलपुर में तीन बार आगमन हुआ और इन यात्राओं ने शहर के शैक्षणिक इतिहास में अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी।


विश्वविद्यालयों की सोच से जुड़ा जबलपुर

स्वतंत्र भारत में विश्वविद्यालय शिक्षा के स्वरूप और विस्तार पर गंभीर विचार-विमर्श का दौर चल रहा था। विश्वविद्यालय शिक्षा से जुड़े आयोग और शिक्षा विशेषज्ञ देशभर में उच्च शिक्षा की आवश्यकताओं का अध्ययन कर रहे थे। इसी क्रम में डा. राधाकृष्णन का जबलपुर प्रवास हुआ।

डा. आनंद सिंह राणा के अनुसार डा. राधाकृष्णन ने जबलपुर की शैक्षणिक संभावनाओं को देखते हुए यहां उच्च शिक्षा के व्यापक विस्तार की आवश्यकता पर विचार किया। उन्होंने दो विश्वविद्यालयों की स्थापना की दिशा में प्रस्ताव और संभावनाओं को रेखांकित किया। आगे चलकर जबलपुर में रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय जैसे महत्वपूर्ण संस्थान स्थापित हुए।

आज संस्कारधानी को मध्य भारत के प्रमुख शैक्षणिक केंद्रों में गिना जाता है। विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों और शोध संस्थानों ने जबलपुर को ज्ञान और उच्च शिक्षा की अलग पहचान दी है। इस शैक्षणिक विकास की पृष्ठभूमि में डा. राधाकृष्णन जैसे दूरदर्शी शिक्षाविदों की भूमिका को स्मरण करना आवश्यक है।

प्रथम दीक्षांत में पहुंचे थे उपराष्ट्रपति

जबलपुर से डा. राधाकृष्णन का संबंध केवल शिक्षा संबंधी विचार-विमर्श तक सीमित नहीं रहा। 1 मार्च 1958 को वे भारत के उपराष्ट्रपति के रूप में जबलपुर विश्वविद्यालय के प्रथम दीक्षा समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। यही विश्वविद्यालय आज रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है।

किसी विश्वविद्यालय का पहला दीक्षा समारोह उसकी शैक्षणिक यात्रा का ऐतिहासिक पड़ाव होता है। ऐसे अवसर पर देश के महान शिक्षाविद और तत्कालीन उपराष्ट्रपति डा. राधाकृष्णन की उपस्थिति जबलपुर के लिए गौरव का विषय थी। उन्होंने शिक्षा और विश्वविद्यालयों की भूमिका पर प्रभावशाली विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर उन्हें विश्वविद्यालय की प्रथम मानद उपाधि भी प्रदान की गई।

उनकी उपस्थिति ने यह संदेश भी दिया कि विश्वविद्यालय केवल परीक्षा और डिग्री प्रदान करने वाले संस्थान नहीं हैं। विश्वविद्यालय विचारों के निर्माण, समाज की बौद्धिक चेतना और राष्ट्र के भविष्य को दिशा देने वाले केंद्र हैं।

राष्ट्रपति बनने के बाद भी पहुंचे जबलपुर

डा. राधाकृष्णन का जबलपुर से तीसरा संबंध राष्ट्रपति बनने के बाद जुड़ा। 20 फरवरी 1965 को नागपुर जाते समय वे अल्पावधि के लिए जबलपुर में रुके। इस तरह उनके तीन प्रवास जबलपुर के इतिहास और स्मृतियों का हिस्सा बन गए।

महान व्यक्तित्वों की यात्राएं केवल तिथियों के रूप में दर्ज नहीं होतीं। वे शहरों की स्मृति में विचार और प्रेरणा के रूप में जीवित रहती हैं। डा. राधाकृष्णन का जबलपुर से जुड़ाव भी इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

संघर्ष से शिखर तक पहुंची प्रतिभा

डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर 1888 को एक साधारण लेकिन विद्वान परिवार में हुआ था। उनके पूर्वज सर्वपल्ली गांव से जुड़े थे, जिसके कारण उनके नाम के साथ सर्वपल्ली जुड़ा। आर्थिक परिस्थितियां सामान्य थीं, लेकिन उनकी प्रतिभा असाधारण थी। उन्होंने छात्रवृत्तियों के सहारे अपनी अधिकांश शिक्षा पूरी की।

मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से दर्शनशास्त्र में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने मात्र 21 वर्ष की आयु में मद्रास प्रेसिडेंसी कॉलेज में दर्शनशास्त्र के जूनियर लेक्चरर के रूप में शिक्षकीय जीवन शुरू किया। वे मैसूर और कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे तथा आंध्र विश्वविद्यालय और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति भी बने।

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पूर्वी धर्म और नैतिकता के प्रोफेसर के रूप में उन्होंने भारतीय दर्शन को विश्व स्तर पर प्रतिष्ठा दिलाई। भारतीय दर्शन और हिंदू चिंतन की आधुनिक तथा तार्किक व्याख्या कर उन्होंने पूर्व और पश्चिम के विचारों के बीच एक मजबूत बौद्धिक सेतु तैयार किया।

शिक्षक दिवस की प्रेरक कहानी

1962 में जब डा. राधाकृष्णन भारत के राष्ट्रपति बने तो उनके मित्र और शिष्य उनका जन्मदिन विशेष रूप से मनाना चाहते थे। उन्होंने व्यक्तिगत उत्सव के बजाय सुझाव दिया कि यदि 5 सितंबर को पूरे देश में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए तो यह उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान होगा।

शिक्षकों के प्रति उनकी गहरी आस्था और सम्मान ने इस विचार को राष्ट्रीय परंपरा बना दिया। तब से 5 सितंबर पूरे देश में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।

उनका मानना था कि शिक्षा केवल रोजगार प्राप्त करने का माध्यम नहीं है। शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य के विवेक को जागृत करना, उसके चरित्र का निर्माण करना और उसे समाज के प्रति जिम्मेदार बनाना है। वे कहते थे कि देश के सबसे उत्कृष्ट मस्तिष्कों को शिक्षक बनना चाहिए।

उच्च शिक्षा को दी नई दिशा

स्वतंत्र भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था को दिशा देने में भी डा. राधाकृष्णन की भूमिका ऐतिहासिक रही। उनकी अध्यक्षता में गठित विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग ने विश्वविद्यालयों की भूमिका और उच्च शिक्षा के भविष्य पर व्यापक विचार किया। आयोग की सिफारिशों ने स्वतंत्र भारत में विश्वविद्यालय शिक्षा के विकास की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

वे भारतीय दर्शन के प्रखर व्याख्याता थे। उन्होंने वेदांत और भारतीय अध्यात्म को आधुनिक संदर्भों में प्रस्तुत करते हुए स्पष्ट किया कि भारतीय दर्शन संसार से पलायन नहीं, बल्कि नैतिक जीवन और लोक-कल्याण की प्रेरणा देता है।

संस्कारधानी के लिए प्रेरक विरासत

डा. राधाकृष्णन 1952 से 1962 तक भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति रहे और 1962 से 1967 तक देश के दूसरे राष्ट्रपति बने। इससे पहले वे सोवियत संघ में भारत के राजदूत रहे। शिक्षा और राष्ट्र के प्रति उनकी असाधारण सेवाओं के लिए उन्हें 1954 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

आज जबलपुर अपने शैक्षणिक संस्थानों और ज्ञान परंपरा पर गर्व करता है तो उसे डा. राधाकृष्णन से जुड़े इस गौरवपूर्ण इतिहास को भी याद करना चाहिए। विश्वविद्यालयों की परिकल्पना से लेकर जबलपुर विश्वविद्यालय के प्रथम दीक्षांत समारोह में उनकी उपस्थिति तक उनका योगदान संस्कारधानी की शैक्षणिक यात्रा का महत्वपूर्ण अध्याय है।

शिक्षक दिवस के अवसर पर डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का स्मरण हमें यह भी याद दिलाता है कि किसी शहर की वास्तविक शक्ति केवल उसकी भौतिक प्रगति में नहीं होती। उसकी असली ताकत उसके विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, शिक्षकों और ज्ञान की संस्कृति में होती है।

संस्कारधानी जबलपुर के लिए डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की यही सबसे बड़ी और प्रेरक विरासत है-ज्ञान को विकास का आधार और शिक्षक को राष्ट्र निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण शिल्पी मानने की विरासत।