
राहुल रैकवार, नईदुनिया, जबलपुर। जैसे-जैसे सूर्य देव के तेवर तीखे हो रहे हैं और पारा 40 डिग्री के पार जाने को बेताब है, संस्कारधानी के लोग अब फ्रिज के कृत्रिम ठंडे पानी और कार्बोनेटेड साफ्ट ड्रिंक्स से किनारा करने लगे हैं।
इस भीषण गर्मी में शहरवासी अपनी सेहत की सुरक्षा के लिए सदियों पुराने 'पारंपरिक आयुर्वेद' और 'देसी खान-पान' की ओर लौट रहे हैं। यही कारण है कि इन दिनों शहर के किराना स्टोर से लेकर आटा चक्कियों तक, 'सत्तू' की मांग में जबरदस्त उछाल देखा जा रहा है।

जबलपुर के लार्डगंज, गढ़ा और रांझी के किराना व्यापारी बोले- इस साल सत्तू की मांग पिछले वर्ष की तुलना में करीब 30 प्रतिशत अधिक है। लोग मिलावट के डर से अब ब्रांडेड कंपनियों के पैकेट बंद सत्तू के बजाय खुद अपनी निगरानी में इसे तैयार करवाना पसंद कर रहे हैं।
किराना स्टोरों पर भुने हुए चने और चने की दाल की बिक्री बढ़ गई है। लोग चने खरीदकर उसे स्थानीय चक्की में पिसवा रहे हैं। चक्की संचालक बोले- 15 दिनों में सत्तू की पिसाई के काम में 20 से 25 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। ग्राहकों का मानना है कि घर पर तैयार सत्तू न केवल शुद्ध होता है, बल्कि उसकी खुशबू और स्वाद भी बाजार वाले सत्तू से कहीं बेहतर होता है।
हाई-प्रोटीन और लो-कैलोरी इसे वर्कआउट के बाद का एक बेहतरीन आहार बनाती है।
देसी प्रोटीन शेक यानी डायबिटीज के मरीजों के लिए भी यह किसी वरदान से कम नहीं है।
घर कासत्तू 'लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स' रक्त शर्करा को नियंत्रित रखने में मदद करता है।

लोग, जो सुबह जल्दी आफिस निकलते हैं, उनके लिए सत्तू का नमकीन शरबत (प्याज, मिर्च और नींबू के साथ) एक 'क्विक मील' बन गया है, जो घंटों तक पेट को भरा रखता है और एनर्जी बनाए रखता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से सत्तू के कई लाभ हैं। शा. आयुर्वेद कालेज, जबलपुर के डा. रामकुमार अग्रवाल बताते हैं कि आयुर्वेद में सत्तू को 'शीतल' और 'बलवर्धक' माना गया है।
सत्तू की खासियत यह है कि इसे कई रूपों में खाया जा सकता है। घरों में इसे मुख्य रूप से चार तरीकों से परोसा जा रहा है।
सत्तू पचने में हल्का, शरीर को ठंडक देने वाला व हाइड्रेशन बनाए रखने में सहायक है। यह कोल्ड ड्रिंक्स की तुलना में अधिक स्वास्थ्यवर्धक है। सत्तू में मौजूद प्रोटीन व फाइबर पाचन को बेहतर बनाते हैं, बल्कि हेल्थ को भी मजबूत करते हैं।
- डा. रामकुमार अग्रवाल, शासकीय आयुर्वेद कालेज, जबलपुर
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