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आलीराजपुर: कट्टीवाड़ा के नूरजहां की मांग, सीजन का रिकॉर्ड- तीन किलो का आम 3500 रुपये में बिका

देश-विदेशों में अपने आकार और स्वाद के लिए प्रसिद्ध नूरजहां आम की मांग बढ़ी है। क्योंकि इस बार मौसम के कारण केवल 300 फल ही पके हैं, जबकि पिछले सालों मे...और पढ़ें

By vishal anand chhatiyeEdited By: Ramnath Mutkule
Publish Date: Tue, 16 Jun 2026 11:33:24 AM (IST)Updated Date: Tue, 16 Jun 2026 11:33:24 AM (IST)
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आलीराजपुर: कट्टीवाड़ा के नूरजहां की मांग, सीजन का रिकॉर्ड- तीन किलो का आम 3500 रुपये में बिका
कट्ठीवाड़ा का नूरजहां आम। (नईदुनिया प्रतिनिधि)

HighLights

  1. मौसम के कारण उत्पादन कम, अब फसल केवल 10 दिन तक
  2. फसल की सुरक्षा भी जरूरी है, यहां 10 लट्ठधारी सुरक्षा गार्ड तैनात है
  3. मूल रूप से अफगानी नस्ल के इस आम की कलम को वर्ष 1965 में कड़े परिश्रम से तैयार किया गया है

नईदुनिया प्रतिनिधि, आलीराजपुर। देश-विदेशों में अपने आकार और स्वाद के लिए प्रसिद्ध नूरजहां आम की मांग बढ़ी है। क्योंकि इस बार मौसम के कारण केवल 300 फल ही पके हैं, जबकि पिछले सालों में इससे ज्यादा की उपज हुई थी। इस सीजन में तीन किलोग्राम वजन का नूरजहां रिकॉर्ड 3500 रुपये में बिका है।

क्षेत्र के किसान शिवराज जादव और भारतसिंह जादव ने बताया कि इस बार बगीचों में नूरजहां का सीमित उत्पादन हुआ है। यह फसल आगामी 10 दिन तक रहेगी। इस साल प्रदेश के साथ ही गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के शौकीनों ने एडवांस बुकिंग कराई थी। उत्पादन कम होने के कारण तेजी से बिक्री हुई।


यहां 10 लट्ठधारी सुरक्षा गार्ड तैनात हैं

नूरजहां आम फसल की सुरक्षा भी जरूरी है। यहां 10 लट्ठधारी सुरक्षा गार्ड तैनात है। किसान बताते हैं कि मूल रूप से अफगानी नस्ल के इस आम की कलम को वर्ष 1965 में गुजरात से लाकर कट्ठीवाड़ा की विशेष आबोहवा और मिट्टी में कड़े परिश्रम से तैयार किया गया है। किसान शिवराज जादव और भारतसिंह जादव के पास नूरजहां प्रजाति के कुल 11 पेड़ हैं।इसमें छह पेड़ फल दे रहे हैं। इस साल डेढ़ किलो से लेकर तीन किलोग्राम तक के फल आए हैं। छोटे फलों की कीमत 1000 से 1500 रुपये है।

गुजरात से लाए पौधा, मौसम व मिट्टी की अनुकलता से कई पेड़ लगे

किसान भारतसिंह जादव का कहना है कि नूरजहां आम का इतिहास बेहद दिलचस्प है। यह प्रजाति मूल रूप से अफगान क्षेत्र की है। मेरे पिता स्वर्गीय रणवीरसिंह जादव वर्ष 1970 के आसपास गुजरात से इस आम की कलम लेकर आए थे। उन्होंने कट्ठीवाड़ा स्थित अपने फार्म में इसे रोपा। यहां वर्षों की कड़ी मेहनत से संरक्षित किया। यह पौधा पूरे आलीराजपुर जिले की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान बन चुका है। साथ ही हमारी आय का स्त्रोत भी बन गया है।

उन्होंने बताया कि जलवायु और मिट्टी के विशेष प्रभाव के कारण नूरजहां के पेड़ों की संख्या बढ़ रही है। फल के लिए विशेष जलवायु और मिट्टी अनुकूल साबित हुई। इसके चलते नूरजहां विशालकाय आकार में ढल सका, जिसके लिए यह दुनियाभर में प्रसिद्ध है। आम के आकार और स्वाद को लेकर इसे 1999 और 2010 में राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित भी किया जा चुका है।

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