
नमन मिश्रा, भोपाल। पूड़़ी-पकौड़ी और समोसे तलने के बाद बचे हुए खाद्य तेल से अब हवाई जहाज भी उड़ेगा। भोपाल स्थित मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (मैनिट) के विज्ञानियों इस खराब खाद्य तेल से ही वैमानिकी ईंधन (एविएशन फ्यूल) बनाने की एक नई तकनीक विकसित की है। दावा है कि यह अभी तक उपलब्ध और इस्तेमाल में आ रही तकनीकों से वित्तीय रूप से सस्ती और पर्यावरण के लिए अधिक सुरक्षित है।
मैनिट के रासायनिक अभियांत्रिकी विभाग के सहायक प्राध्यापक डा. सुमित एच. धावने, पदार्थ व धातुकर्म अभियांत्रिकी विभाग के सहायक प्राध्यापक डा. रामकिशोर अनंत और शोधार्थी रेहान खान ने दो साल पहले इस परियोजना पर काम शुरू किया था।
यह दुनिया भर में जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने के लिए हो रहे शोध का हिस्सा था। इस्तेमाल हो चुके खाद्य तेल को वैमानिकी ईंधन जैसे प्रीमियम उत्पाद में बदलने के लिए मैनिट के विज्ञानियों से एक विशेष प्रकार के उत्प्रेरक का उपयोग किया है, जो खराब खाद्य तेल को रिएक्टर के भीतर छोटे-छोटे हाइड्रोकार्बन अणुओं में तोड़ देता है।
इस रासायनिक क्रिया के दौरान ही आवश्यक हाइड्रोजन उत्पन्न हो जाती है और उसी का उपयोग ईंधन बनाने में कर लिया जाता है। इस तरह यह पूरी प्रक्रिया आत्मनिर्भर बन जाती है। इसी की वजह से यह तकनीक अभी तक प्रचलित हाइड्रोक्रैकिंग प्रक्रिया की तुलना में अधिक सरल और प्रभावी मानी जा रही है।
कहा जा रहा है कि इससे दो बड़े फायदे हुए हैं, पहला- उत्पादन लागत में उल्लेखनीय कमी आई है और दूसरा- फासिल-फ्यूल आधारित हाइड्रोजन पर निर्भरता कम होने से कार्बन उत्सर्जन और पर्यावरणीय नुकसान दोनों घटते हैं। यह शोध अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हो चुका है। मैनिट ने अपनी पूर्णत: स्वदेशी तकनीक को पेटेंट कराने का आवेदन भी दे दिया है। तकनीक का पेटेंट हासिल होने के बाद इसके व्यावसायिक उपयोग पर करार होगा।
यह भी पढ़ें- भगवान बुद्ध के शिष्यों के पवित्र अस्थि कलश मंगोलिया जाएंगे, सांची में होगा गार्ड ऑफ ऑनर
गैर जीवाश्म टिकाऊ वैमानिकी ईंधन के क्षेत्र में पिछले साल बड़ी सफलता मिली थी। इंडियन आयल कारपोरेशन ने पानीपत में एक संयंत्र लगाया है जो खराब खाद्य तेल को वैमानिकी ईंधन में बदलता है। मैनिट के विज्ञानियों का कहना है कि यह महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन उनकी हाइड्रोक्रैकिंग आधारित प्रक्रिया में बाहरी हाइड्रोजन की आवश्यकता होती है, जो जीवाश्म ईंधनों से ही मिलती है।
इससे कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है, जो पर्यावरण के लिए ठीक नहीं है। मैनिट की नई तकनीक में इन-सीटू हाइड्रोजन उत्पादन की व्यवस्था है, यानी उत्पादन की प्रक्रिया में ही हाइड्रोजन बन जाता है।