ट्रीटमेंट के बाद भी शुद्ध नहीं हो रहा भोपाल-इंदौर का सीवेज, एसटीपी से साफ पानी में भी माइक्रोप्लास्टिक, कैंसर का बढ़ा खतरा
विज्ञानियों ने भोपाल के तीन और इंदौर के चार एसटीपी से नमूने एकत्र किए। विश्लेषण करने पर पता चला कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स में आने वाले अशोधित पानी म ...और पढ़ें
Publish Date: Mon, 23 Mar 2026 06:35:15 AM (IST)Updated Date: Mon, 23 Mar 2026 06:36:47 AM (IST)
कबीटखेड़ी स्थित सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (फाइल फोटो)HighLights
- एसटीपी से साफ पानी में भी माइक्रोप्लास्टिक
- ट्रीटमेंट प्लांट्स नहीं रोक पा रहे माइक्रोप्लास्टिक का जहर
- ट्रीटमेंट के बाद भी पानी में रह जाते हैं प्लास्टिक के सूक्ष्म कण
अंजली राय, नईदुनिया भोपाल। नदी-तालाबों को सीवर की गंदगी से बचाने के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) लगाए गए थे। कोशिश थी कि इनसे पानी को उपचारित कर ही जलस्रोतों में छोड़ा जाएगा, ताकि वे प्रदूषित होने से बच जाएं। इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (आइसर) भोपाल, इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) और नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च इन एन्वायर्नमेंटल हेल्थ (एनआईआरइएच) के शोध से पता चला है कि ये एसटीपी माइक्रोप्लास्टिक के खतरे को पूरी तरह नहीं रोक पा रहे हैं।
विज्ञानियों ने भोपाल के तीन और इंदौर के चार एसटीपी से नमूने एकत्र किए। इन नमूनों में अशोधित पानी, उपचारित पानी और प्लांट से निकलने वाली गाद (स्लज) का विश्लेषण किया गया। इससे पता चला कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स में आने वाले अशोधित पानी में प्रति लीटर 35 माइक्रोप्लास्टिक मौजूद थे। पानी को उपचारित करने के बाद भी यह मात्रा घटकर प्रति लीटर 13 माइक्रोप्लास्टिक की रह गई। यह कमी पर्याप्त नहीं मानी जा रही है, क्योंकि यह माइक्रोप्लास्टिक अंततः जलाशयों और नदियों में पहुंचकर जलीय जीवन और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा बन रहा है।
प्रति किलो गाद में भी 390 सूक्ष्मकण मिले हैं जो बेहद खतरनाक हैं। शहरों में एसटीपी से उपचारित जल को स्वच्छ मानकर उन नदियों-तालाबों में छोड़ा जाता है, जिनके पानी को पेयजल के रूप में उपयोग किया जाता है। वहीं एसटीपी की गाद को अक्सर खेतों या खुले स्थानों पर छोड़ दिया जाता है, इससे अनाजों और सब्जियों में प्लास्टिक के प्रवेश की संभावना भी बढ़ जाती है।
पारंपरिक एसटीपी काफी नहीं
विज्ञानियों का कहना है कि वर्तमान में उपयोग होने वाली पारंपरिक एसटीपी तकनीकें माइक्रोप्लास्टिक को पूरी तरह हटाने में सक्षम नहीं हैं। अधिकांश संयंत्रों में तृतीयक उपचार (एडवांस्ड फिल्ट्रेशन और कीटाणुशोधन) की कमी है, जो इस समस्या को और बढ़ा रही है।