
नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। मध्य प्रदेश का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक इतिहास न केवल अपनी वास्तुकला बल्कि अपनी अनूठी डाक प्रणाली के लिए भी दुनिया भर में प्रसिद्ध है। ब्रिटिश काल के दौरान जब देश की अधिकतर रियासतें अंग्रेजों की डाक व्यवस्था पर निर्भर थीं, तब भोपाल रियासत के पास अपना खुद का डाक टिकट छापने का दुर्लभ अधिकार था। आज भोपाल रियासत के ये विंटेज डाक टिकट दुनिया भर के डाक टिकट संग्रहकर्ताओं (Philatelists) और इतिहासकारों के लिए एक अनमोल धरोहर बन चुके हैं।
भोपाल में डाक व्यवस्था की शुरुआत साल 1847 में नवाब सिकंदर जहां बेगम के शासनकाल में हुई थी, जबकि पहला डाक टिकट 1872 में नवाब शाहजहां बेगम के दौर में जारी किया गया था। शुरुआती दिनों में ये डाक टिकट 'गवर्नमेंट सुल्तानिया प्रेस' में पत्थरों पर हाथ से लिथोग्राफी तकनीक द्वारा छापे जाते थे। हर टिकट की छपाई मैनुअल होने के कारण कोई भी दो टिकट एक जैसे नहीं दिखते थे, जो इन्हें संग्रहकर्ताओं के लिए बेहद खास और दुर्लभ बनाता है।
इन विंटेज टिकटों की सबसे बड़ी खासियत इनकी छपाई में हुई वर्तनी (Spelling) की गलतियां हैं। 'NAWAB' की जगह 'NWAB' और 'BEGUM' की जगह 'BEGAN' लिखे हुए टिकटों को बाद में दुर्लभ किस्म मानकर सहेजा गया। भोपाल के इन ऐतिहासिक डाक टिकटों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मध्य प्रदेश का मान बढ़ाया है। लंदन की प्रसिद्ध 'ग्रोसवेनर फिलैटेलिक ऑक्शंस' में इन गलत वर्तनी वाले टिकटों और शीट्स की नीलामी लाखों रुपये में हुई है।
इन टिकटों पर भोपाल रियासत का राजचिह्न 'दो मछलियां' अंकित होती थीं, जबकि 1936 से 1947 के बीच जारी टिकटों पर बाघ और चित्तीदार हिरण जैसे वन्यजीवों को जगह दी गई। भोपाल का यह अनोखा डाक इतिहास आज भी मध्य प्रदेश की समृद्ध विरासत के रूप में वैश्विक पटल पर चमक रहा है।
यह भी पढ़ें- दिल्ली बिल्डिंग हादसे में देवास के छात्र की मौत, कल सुबह ही पहुंचा था और दोपहर में गिर गई पीजी की बिल्डिंग