
नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दो महत्वपूर्ण कीमोथेरेपी दवाएं सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन इन दिनों भोपाल समेत देश के कई हिस्सों में मरीजों को नहीं मिल पा रही हैं। पिछले दो से तीन सप्ताह से इन दवाओं की भारी कमी बनी हुई है, जिससे कैंसर मरीजों और उनके परिजनों की चिंता बढ़ गई है।
ये दोनों दवाएं फेफड़ों, मुंह, गर्भाशय ग्रीवा (सर्वाइकल), ओवरी, टेस्टिकुलर और सिर-गर्दन के कैंसर समेत कई प्रकार के कैंसर के इलाज में फर्स्ट लाइन थेरेपी के रूप में उपयोग की जाती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इन दवाओं की कमी का सीधा असर मरीजों के इलाज पर पड़ सकता है।
जवाहरलाल नेहरू कैंसर अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र के प्रबंध संचालक डॉ. किसलय शर्मा ने बताया कि इन दवाओं के निर्माण में प्लैटिनम का उपयोग होता है, जिसका कच्चा माल मुख्य रूप से विदेशों, विशेषकर चीन और अन्य देशों से आयात किया जाता है। पिछले एक वर्ष में प्लैटिनम की कीमत लगभग 2,000 रुपये प्रति ग्राम से बढ़कर 5,000 रुपये प्रति ग्राम तक पहुंच गई है। इससे दवा निर्माण की लागत में भारी वृद्धि हुई है।
उन्होंने बताया कि सरकार ने इन दवाओं की कीमतों पर मूल्य सीमा (प्राइस कैप) तय कर रखी थी। ऐसे में उत्पादन लागत बढ़ने के बावजूद कंपनियां दवाओं की कीमत नहीं बढ़ा पा रही थीं। कई मामलों में कच्चे माल और निर्माण की लागत ही बाजार में निर्धारित अधिकतम कीमत से अधिक हो गई। नतीजतन कई कंपनियों ने उत्पादन कम कर दिया या अस्थायी रूप से बंद कर दिया।
विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर प्लैटिनम की उपलब्धता में कमी, अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन में बाधाएं और पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने भी स्थिति को और गंभीर बना दिया है। भारत प्लैटिनम के लिए आयात पर काफी हद तक निर्भर है, इसलिए वैश्विक बाजार में उतार-चढ़ाव का सीधा असर दवा उद्योग पर पड़ रहा है।
एम्स भोपाल के कैंसर विशेषज्ञ डॉ. विनय कुमार ने बताया कि दवाओं की कमी के कारण कुछ मरीजों की कीमोथेरेपी टालनी पड़ रही है, जबकि कुछ मामलों में डॉक्टरों को वैकल्पिक दवाओं का सहारा लेना पड़ रहा है। सरकारी अस्पतालों में स्थिति अधिक चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। ये दवाएं प्लैटिनम से बनती हैं जिसे सफेद सोना कहते हैं। इसके रेट में पिछले एक साल से उछाल देखा जा रहा था, लेकिन सरकार दवाओं की कीमत नहीं बढ़ा रही थी। इससे कंपनियों को दवाओं को बनाने के लिए उपयोग होने वाला कच्चा माल महंगा पड़ रहा था।
अब राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) ने 11 जून 2026 से सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन की अधिकतम कीमतों में 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की अनुमति दी है। सरकार का मानना है कि इससे दवा कंपनियां दोबारा उत्पादन बढ़ा सकेंगी और बाजार में आपूर्ति सामान्य होने लगेगी।