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MP-CG के 4.5 लाख पेंशनरों के लिए खुशखबरी, 25 साल बाद DR से हटेगा सहमति का झंझट, धारा 49 की बाध्यता होगी खत्म

मध्य प्रदेश के वित्त विभाग ने छत्तीसगढ़ को पत्र लिखकर डीआर में वृद्धि के लिए इस व्यवस्था को समाप्त करने के लिए सहमति मांगी है।

By Vaibhav ShridharEdited By: Dheeraj Belwal
Publish Date: Fri, 12 Jun 2026 10:29:30 PM (IST)Updated Date: Sat, 13 Jun 2026 07:17:21 AM (IST)
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MP-CG के 4.5 लाख पेंशनरों के लिए खुशखबरी, 25 साल बाद DR से हटेगा सहमति का झंझट, धारा 49 की बाध्यता होगी खत्म
4.5 लाख पेंशनर्स को समय पर मिलेगा केंद्र के समान लाभ।

HighLights

  1. पेंशनरों की महंगाई राहत (DR) से हटेगा सहमति का झंझट
  2. 4.5 लाख पेंशनर्स को समय पर मिलेगा केंद्र के समान लाभ
  3. धारा 49 की बाध्यता खत्म करने की तैयारी में एमपी-सीजी

नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के साढ़े चार लाख से अधिक पेंशनरों की महंगाई राहत (डीआर) में वृद्धि के लिए दोनों राज्यों को एक-दूसरे की सहमति की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। इसमें कई बार महीनों लग जाते हैं क्योंकि राज्य अपनी वित्तीय स्थिति को देखते हुए निर्णय लेते हैं। पेंशनरों से जुड़े संगठन बार-बार यह बात उठाते हैं कि उन्हें जिस समय से भारत सरकार पेंशनरों की महंगाई राहत बढ़ाती है, तभी से लाभ दिया जाए मगर ऐसा नहीं हो पाता।

कई बार तो एरियर भी नहीं दिया जाता। इसे देखते हुए मध्य प्रदेश के वित्त विभाग ने छत्तीसगढ़ को पत्र लिखकर डीआर में वृद्धि के लिए इस व्यवस्था को समाप्त करने के लिए सहमति मांगी है। माना जा रहा है कि दोनों राज्यों में एक ही दल की सरकार होने से इस व्यवस्था को बदलने पर सहमति बन जाएगी।


राज्य पुनर्गठन अधिनियम की धारा 49

वर्ष 2000 में मध्य प्रदेश से विभाजित होकर छत्तीसगढ़ राज्य बना। राज्य पुनर्गठन अधिनियम की धारा 49 में वित्तीय मामलों में दोनों राज्यों की सहमति का प्रावधान रखा गया। मंशा यही थी कि किसी राज्य पर भार न आए और सब कुछ व्यवस्थित तरीके से हो। पेंशनरों के मामले में यह निर्धारित हुआ कि 76 प्रतिशत वित्तीय भार मध्य प्रदेश और 24 प्रतिशत छत्तीसगढ़ उठाएगा।

यह प्रावधान वर्ष 2000 के पहले के कर्मचारियों के संदर्भ में था। इसके कारण जब भी केंद्र सरकार पेंशनरों की डीआर में वृद्धि करती तो कभी मध्य प्रदेश तो कभी छत्तीसगढ़, पत्र लिखकर दूसरे राज्य से महंगाई राहत बढ़ाने के लिए सहमति मांगते हैं। इसमें समय लगता है। जबकि, इसकी आवश्यकता ही नहीं है क्योंकि फॉर्मूला तय है और राशि आज नहीं तो कल देनी ही है।

अतीत के प्रयास और वर्तमान प्रशासनिक पहल

कमल नाथ सरकार के समय इस प्रावधान को समाप्त करने की पहल हुई थी। कैबिनेट में निर्णय भी लिया गया मगर बात आगे नहीं बढ़ पाई। कर्मचारी आयोग ने भी इस संबंध में अनुशंसा की लेकिन बात जहाँ की तहाँ रही। मुख्य सचिव अनुराग जैन भी इसके पक्ष में रहे हैं। वे कमल नाथ सरकार में वित्त विभाग का जिम्मा संभाल रहे थे। उनके समय ही पेंशन नियम पर नए सिरे से बात शुरू हुई थी, जो अब पूरी हुई। उधर, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भी इस बात के पक्ष में थे कि व्यवस्था में सुधार होना चाहिए। इसे देखते हुए अपर मुख्य सचिव (वित्त) मनीष रस्तोगी के निर्देश पर विभाग की ओर से छत्तीसगढ़ को प्रस्ताव भेजा गया है।

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केंद्र सरकार भी कह चुकी है सहमति की आवश्यकता नहीं

पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन के संरक्षक गणेश दत्त जोशी का कहना है कि केंद्र सरकार वर्ष 2025 में हाई कोर्ट जबलपुर में इस संबंध में दायर याचिका में कह चुकी है कि दोनों राज्य चाहें तो सहमति के झंझट से मुक्ति पा सकते हैं मगर इसके लिए भी सहमति अनिवार्य है।