
मोहम्मद अबरार खान, भोपाल: हरे-भरे पहाड़ों की गोद में बसा झीलों का शहर भोपाल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ गौरवशाली इतिहास के लिए भी प्रसिद्ध है। भोपाल शहर केवल राजाओं और नवाबों के शासन के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि यहां की रानियों और बेगमों के साहस, दूरदर्शिता और प्रशासनिक क्षमता ने भी शहर को विशिष्ट पहचान दी है। इंटरनेशनल विमेंस डे (International Women's Day 2026) पर जानते हैं इनकी कहानियां-
राजा भोज और गौंड शासन का दौर
नवाबी इतिहास के जानकार रिजवान अंसारी के अनुसार भोपाल के बड़ा तालाब का निर्माण परमार वंश के राजा भोज ने कराया था। उनके बाद इस क्षेत्र में गौंड शासन स्थापित हुआ। यह समय मुगल बादशाह शाहजहां के शासनकाल के दौरान लगभग 1645 का था।
उस समय राजा संग्राम शाह की गौंडवाना हुकूमत थी। उनके अधीन तीन महत्वपूर्ण किले थे गिन्नोरगढ़ (सीहोर), चौकीगढ़ (बाड़ी) और भूपालगढ़ (भोपाल)।
बाद में स्थानीय शासकों ने संग्राम शाह के खिलाफ विद्रोह कर दिया। इससे नाराज होकर संग्राम शाह ने मुगल बादशाह शाहजहां से मदद मांगी। इसके बाद 1645 में मुगल सेना यहां भेजी गई। मुगल सेना ने इन किलों को अपने अधीन कर लिया और बाद में संधि के बाद इन्हें स्थानीय शासकों को वापस सौंप दिया गया।
कमला पार्क के पास स्थित भूपालगढ़ किला उसी दौर की ऐतिहासिक धरोहर माना जाता है। यहां गौंड राजा भूपाल शाह निवास करते थे। माना जाता है कि उन्हीं के नाम पर इस शहर का नाम भोपाल पड़ा।
बाद में इस किले का जीर्णोद्धार निजाम शाह और उनकी पत्नी गौंड रानी कमलापति ने कराया। इसे उन्होंने अपने निवास के रूप में विकसित किया।
बड़ा तालाब के किनारे स्थित सात मंजिला रानी कमलापति महल आज भी उस दौर की स्थापत्य कला का शानदार उदाहरण है। महल के आसपास का क्षेत्र आज कमला पार्क के नाम से जाना जाता है।
इतिहास में रानी कमलापति को 18वीं शताब्दी में भोपाल और गिन्नौरगढ़ की अंतिम गौंड हिंदू शासक माना जाता है। उन्हें एक साहसी और स्वाभिमानी वीरांगना के रूप में याद किया जाता है। उनके सम्मान में वर्ष 2021 में भोपाल के हबीबगंज रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर रानी कमलापति रेलवे स्टेशन रखा गया।
पुरातत्वविद् पूजा सक्सेना के अनुसार गौंड राजा संग्राम शाह के शासनकाल में पूरे क्षेत्र में 52 गढ़ हुआ करते थे। इनमें भोपाल और गिन्नौरगढ़ भी शामिल थे।
बाद में गौंड रानी दुर्गवती ने रायसेन किले पर विजय प्राप्त कर अपनी वीरता का परिचय दिया। यह दौर मध्य भारत में गौंड शासन की शक्ति और प्रभाव का प्रतीक माना जाता है।
गौंड शासन के बाद भोपाल में नवाबी दौर की शुरुआत हुई। नवाब दोस्त मोहम्मद खान ने इस शहर को बसाया और 1723 से 1949 तक यहां नवाबों का शासन रहा।
हालांकि इस दौर में भी महिलाओं की भूमिका बेहद प्रभावशाली रही। इसी काल में मां जी ममोला का नाम प्रमुख रूप से सामने आता है, जिन्हें इतिहास में एक तरह से “अघोषित नवाब” कहा जाता है।

मां जी ममोला नवाब दोस्त मोहम्मद खान के बेटे नवाब यार मोहम्मद खां की गैर मुस्लिम पत्नी थीं। इसके बावजूद उन्हें इतना सम्मान प्राप्त था कि लोग उनका नाम लेने के बजाय उन्हें “मां जी” कहकर संबोधित करते थे।उन्होंने नवाब यार मोहम्मद, फैज मोहम्मद और हयात मोहम्मद इन तीनों के शासनकाल में प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभालीं। हयात मोहम्मद को नवाब बनवाने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
शहर में आज भी उनके नाम से तीन मस्जिदें मौजूद हैं। छोटा तालाब भी उनके मार्गदर्शन में दीवान छोटे खां के नाम से बनवाया गया था। उनकी प्रशासनिक क्षमता और प्रभाव के कई किस्से इतिहास में दर्ज हैं।
भोपाल के इतिहास का सबसे अनोखा अध्याय वह है जब लगभग 107 वर्षों तक महिलाओं ने रियासत की बागडोर संभाली।
1819 से 1926 के बीच चार महिला शासकों कुदसिया बेगम, सिकंदर बेगम, शाहजहां बेगम और सुल्तान जहां बेगम ने भोपाल रियासत पर शासन किया। इन शासकों को उनकी आधुनिक नीतियों और विकास कार्यों के लिए आज भी याद किया जाता है।
भोपाल की पहली महिला शासक नवाब कुदसिया बेगम थीं, जिनका शासनकाल 1819 से 1837 तक रहा। उन्होंने अपने दामाद जहांगीर मोहम्मद के खिलाफ आष्टा में युद्ध लड़ा और विजय प्राप्त की। इस युद्ध में उनके सेनापति खुश्वक्त राय सक्सेना थे।
दूसरी महिला शासक सिकंदर बेगम का शासनकाल 1860 से 1868 तक रहा। उन्हें मजबूत प्रशासन और भोपाल की सेना को संगठित एवं शक्तिशाली बनाने के लिए जाना जाता है।
तीसरी महिला शासक शाहजहां बेगम का शासनकाल 1844 से 1860 और 1868 से 1901 तक रहा। वे मुगल बादशाह शाहजहां से काफी प्रभावित थीं। उनके दौर में शाहजहानाबाद सिटी, ताजमहल पैलेस, ताजुल मसाजिद और सीढ़ीनुमा तीन तालाबों की जल संरचना जैसे महत्वपूर्ण निर्माण कार्य हुए।
भोपाल की अंतिम महिला शासक नवाब सुल्तान कैखुसरो जहां बेगम थीं, जिन्हें लोग “सरकार अम्मा” के नाम से भी जानते थे। वे 1901 से 1926 तक रियासत की शासक रहीं।
सुल्तान जहां बेगम महिलाओं की आजादी, आधुनिक शिक्षा और नगर प्रशासन के विकास के लिए जानी जाती हैं। वे दुनिया की पहली महिला थीं जिन्हें किसी विश्वविद्यालय का चुना हुआ चांसलर बनने का सम्मान मिला।
1920 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना के बाद उन्हें उसका पहला चांसलर बनाया गया। उन्होंने स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। उनके प्रयासों से चलित औषधालय और मोहल्ला औषधालय स्थापित हुए। उन्होंने स्वास्थ्य विषय पर कई पुस्तकें भी लिखीं और शहर का पहला महिला अस्पताल सुल्तानिया जनाना अस्पताल बनवाया।
इतिहासकार डॉ. आलोक गुप्ता बताते हैं कि रानी कमलापति से पहले रानी शालमली का भी उल्लेख मिलता है। उनका जिक्र बेगम शाहजहां और सुल्तान जहां की आत्मकथाओं में मिलता है।
चौक बाजार में उनके द्वारा बनाए गए सभा मंडप में लगभग पांच सौ बच्चे शिक्षा प्राप्त करते थे। वे परमावंश से थीं और शिक्षा तथा सामाजिक गतिविधियों के संरक्षण के लिए जानी जाती थीं।
आजादी के बाद जब भोपाल रियासत के भारत में विलय का आंदोलन चला, तब भी शहर की महिलाओं ने साहस और संघर्ष का परिचय दिया।
इस आंदोलन में मोहनी देवी, शांती देवी, बसंती देवी और रुकमणी देवी जैसे नाम प्रमुख रूप से सामने आए। आंदोलन के दौरान नवाब की पुलिस इन महिलाओं को शहर से लगभग 50 किलोमीटर दूर छोड़ देती थी। इसके बावजूद वे दो-तीन दिन भूखी-प्यासी पैदल चलकर वापस लौटती थीं और अपने संघर्ष को जारी रखती थीं।
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रानी कमलापति की वीरता, मां जी ममोला की प्रशासनिक कुशलता और भोपाल की बेगमों के प्रगतिशील शासन ने मिलकर इस शहर को एक विशिष्ट पहचान दी है।
इसी वजह से भोपाल को भारतीय इतिहास में महिला नेतृत्व, संस्कृति और सामाजिक प्रगति की अनोखी विरासत वाले शहर के रूप में देखा जाता है।