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'NO Smoking' वाले भी सावधान: भोपाल में सामने आया फेफड़ों के कैंसर का बेहद रेयर केस, एडवांस तकनीक से बची जान

जेपी जिला अस्पताल की मेडिकल टीम ने 32 वर्षीय एक ऐसे युवा मरीज में फेफड़ों के कैंसर का पता लगाया है, जिसे धूम्रपान की कोई लत नहीं थी। 'ब्रोंकोस्कोपी' त...और पढ़ें

By mukesh vishwakarmaEdited By: bhupendra Singh Rajput
Publish Date: Fri, 19 Jun 2026 02:38:18 PM (IST)Updated Date: Fri, 19 Jun 2026 02:42:38 PM (IST)
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'NO Smoking' वाले भी सावधान: भोपाल में सामने आया फेफड़ों के कैंसर का बेहद रेयर केस, एडवांस तकनीक से बची जान
प्रतीकात्मक फोटो, इंटरनेट मीडिया।

HighLights

  1. आमतौर पर बुजुर्गों और चेन-स्मोकर्स को होने वाला कैंसर 32 साल के 'नॉन-स्मोकर' युवा में मिला
  2. छाती में तकलीफ और फेफड़ा सिकुड़ने के बाद जेपी अस्पताल में कराया गया था भर्ती
  3. बिना बड़ी चीर-फाड़ के 'ब्रोंकोस्कोपी' तकनीक से की सटीक पहचान, समय रहते बची जान

नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। अगर आप सोचते हैं कि फेफड़ों का कैंसर सिर्फ सिगरेट-बीड़ी पीने वालों या बड़ी उम्र के बुजुर्गों को ही होता है, तो भोपाल से आई यह खबर आपकी आंखें खोल देगी। राजधानी के जेपी जिला अस्पताल की मेडिकल टीम ने एक बेहद चुनौतीपूर्ण और दुर्लभ मामले का पर्दाफाश किया है।

डॉक्टरों ने मात्र 32 साल के एक ऐसे युवा में फेफड़ों के कैंसर की सटीक पहचान की है, जिसने कभी धूम्रपान को हाथ तक नहीं लगाया। चिकित्सा विज्ञान की दुनिया में इस उम्र के नॉन-स्मोकर व्यक्ति में ऐसा कैंसर मिलना बेहद रेयर माना जाता है।


सिकुड़ गया था फेफड़ा, अंदर भर चुका था पानी

इस 32 वर्षीय मरीज को जब जेपी अस्पताल लाया गया, तो उसकी हालत बेहद गंभीर थी। उसके दाहिने फेफड़े में भारी मात्रा में पानी भर गया था और फेफड़ा सिकुड़ना शुरू हो चुका था। सामान्य तौर पर ऐसे लक्षणों को लोग टीबी या साधारण इन्फेक्शन मान लेते हैं, लेकिन जेपी अस्पताल के पल्मोनोलॉजिस्ट्स ने मामले की गंभीरता को भांप लिया और तुरंत एक एडवांस टेस्ट करने का फैसला किया।

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बिना चीर-फाड़ 'कैमरे वाली नली' से हुआ इलाज

अस्पताल के टीबी एवं चेस्ट स्पेशलिस्ट डॉ. अंकित तोमर, डॉ. नवीन शर्मा और एनेस्थीसिया विशेषज्ञ डॉ. निशा बड़वे की टीम ने मोर्चा संभाला। डॉक्टरों ने मरीज की ब्रोंकोस्कोपी-गाइडेड बायोप्सी की।

क्या होती है यह तकनीक

यह एक अत्याधुनिक मिनिमल इनवेसिव (कम चीर-फाड़ वाली) तकनीक है। इसमें एक बेहद पतली और लचीली ट्यूब (ब्रोंकोस्कोप) को सांस की नली के जरिए फेफड़ों तक भेजा जाता है। इस ट्यूब के आगे कैमरा और लाइट लगी होती है, जिससे डॉक्टर स्क्रीन पर फेफड़ों के अंदर का लाइव हाल देख लेते हैं और वहीं से जांच के लिए मांस का टुकड़ा (बायोप्सी सैंपल) निकाल लेते हैं।

जांच के दौरान हल्का ब्लीडिंग का खतरा बना, लेकिन एक्सपर्ट डॉक्टरों ने उसे तुरंत कंट्रोल कर लिया। मरीज की हालत इतनी स्थिर रही कि टेस्ट के अगले ही दिन उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।

हिस्टोपैथोलॉजी रिपोर्ट ने उड़ाए होश, पर समय रहते टला बड़ा खतरा

जब लैब से हिस्टोपैथोलॉजी रिपोर्ट आई, तो उसमें 'लंग एडेनोकार्सिनोमा' (फेफड़ों का कैंसर) होने की पुष्टि हुई। डॉक्टर भी हैरान थे कि बिना किसी लत के इतनी कम उम्र में यह कैंसर कैसे पनप गया। हालांकि, जेपी अस्पताल की मुस्तैदी के कारण इस जानलेवा बीमारी को शुरुआती स्टेज में ही पकड़ लिया गया है।

समय पर सही डायग्नोसिस होने के कारण अब मरीज की 'टारगेटेड थेरेपी' शुरू कर दी गई है, जिससे उसके पूरी तरह ठीक होने की उम्मीद काफी बढ़ गई है।

सरकारी जेपी अस्पताल में इस आधुनिक तकनीक के शुरू होने से अब तक 20 से अधिक मरीजों की बिना किसी परेशानी के जटिल जांचें की जा चुकी हैं, जो गरीब मरीजों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।

हिस्टोपैथोलाजी रिपोर्ट में मरीज को लंग एडेनोकार्सिनोमा (फेफड़ों का कैंसर) होने की पुष्टि हुई है। आमतौर पर यह कैंसर बुजुर्गों में होता है, लेकिन युवाओं में इसके लक्षण मिलना गंभीर विषय है। समय पर सही पहचान होने से अब मरीज का आगे की टारगेटेड थैरेपी शुरू की जा सकेगी।- डॉ. अंकित तोमर, टीबी एवं चेस्ट स्पेशलिस्ट, जेपी अस्पताल