
राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, भोपाल। सुविधाओं का सूखा होने के बाद भी स्वास्थ्य महकमा आंकड़े हरे-हरे दिखाने में लगा है। यही कारण है जमीनी सच्चाई सामने ही नहीं आ रही है। वर्ष 2025 में सितंबर से दिसंबर के बीच छिंदवाड़ा, पांढुर्णा और बैतूल में विषाक्त कफ सीरप से 25 बच्चों की मृत्यु हो गई। देशभर में किरकिरी हुई तो लगा विभाग में पुराना ढर्रा बदलने वाला है, पर कोई सबक नहीं लिया गया। डाक्टर व अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की पदस्थापना से लेकर अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने पर ध्यान नहीं दिया।
बालाघाट हमेशा से मलेरिया के लिए संवेदनशील जिलों में शामिल रहा है। अब मलेरिया और मीजेल्स (खसरा) मिलकर बच्चों के लिए काल बने तो विभाग के अधिकारी दावा कर रहे हैं कि पहले भी यहां मलेरिया से मौतें होती रही हैं। उधर, राष्ट्रीय वेक्टर बार्न रोग नियंत्रण कार्यक्रम के आंकड़े देखें तो वर्ष 2022 से 2026 के बीच पांच वर्ष में मलेरिया से किसी की मृत्यु नहीं हुई है। उधर, खसरा, मलेरिया और कुपोषण के चलते बालाघाट के बैहर और बिरसा ब्लाक में ने एक माह के भीतर 25 बच्चों की मौत ने फिर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
बैहर और बिरसा दोनों ब्लॉक में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) हैं। इसके बाद भी 15 दिन से अधिक समय तक यही चलता रहा है कि रहस्यमय बीमारी आ गई है। सबसे सामान्य तरीके से पता की जा सकने वाली मलेरिया और खसरा का पता भी स्वास्थ्य महकमे की स्थानीय टीम नहीं लगा पाई। हल्ला मचा तो भोपाल से टीम पहुंची। पूरा विभाग क्षेत्र के लोगों को जिम्मेदार बताने में लगा है। फीवर सर्वे कराया जाता तो बच्चों की बीमारी गंभीर होने के पहले ही उपचार मिल जाता, जिससे उन्हें बचाया जा सकता था।
प्रदेश में स्वास्थ्य क्षेत्र का बजट 23 हजार करोड़ रुपये है। सुविधाओं के नाम पर अस्पताल बना दिए गए, मशीनें भी आ गईं पर जांच और उपचार करने वाले डाक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ 50 प्रतिशत भी नहीं हैं। बालाघाट में खसरा, मलेरिया और कुपोषण के कहर ने पूरे सिस्टम पर प्रश्न उठा दिए हैं। पिछले साल दिसंबर में माओवादियों का सफाया होने के बाद विशेष अभियान चलाकर टीकाकरण नहीं किया गया। हालांकि, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस- 6) के आंकड़ों के अनुसार बालाघाट में खसरारोधी टीकाकरण का कवरेज 93 प्रतिशत है।
बालाघाट के लांजी से विधायक रहे किशोर समरीते का कहना है कि बालाघाट में खसरा, मलेरिया, पीलिया एवं दूषित पेयजल से 25 से ज्यादा बच्चों की मौत हुई। उनका दावा है कि जिले में आदिवासी अंचलों में 110 बच्चों की मौत पिछले छह माह में हुई है, सरकार मौत के आंकड़े छुपा रही है और दोषी अधिकारियों को बचा रही है। मध्य प्रदेश में भारिया जनजाति, कोरबा जनजाति और बैगा जनजाति को बचाए रखने एवं इनके विकास के लिए केंद्र सरकार ने कुल 2500 करोड़ रुपये भेजे जिसका कोई हिसाब नहीं है, पैसा कहां खर्च हुआ?
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कोरोना के समय टीकाकरण का कवरेज कम हो गया था। दूसरा बालाघाट माओवादी समस्या से भी प्रभावित रहा है। ऐसे में दिसंबर में माओवादियों के सफाए के बाद ज्यादा प्रभावित क्षेत्र में विशेष स्वास्थ्य शिविर लगाकर जांच की जानी चाहिए थी। टीकाकरण के लिए भी विशेष अभियान चलाने की आवश्यकता थी। यह तर्क भी ठीक नहीं है कि खसरा से मृत्यु नहीं होती। इसके कारण कई समस्याएं होती हैं जो जानलेवा होती हैं। -डा. पंकज शुक्ला, पूर्व संचालक, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन।