
वैभव श्रीधर, नईदुनिया, भोपाल। विधानसभा और लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के हाथों करारी शिकस्त झेलने के बाद मध्य प्रदेश कांग्रेस ने खुद को खड़ा करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी। शीर्ष स्तर पर सर्जरी की गई, पुराने चेहरों को पीछे कर जीतू पटवारी को प्रदेश अध्यक्ष और उमंग सिंघार को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की कमान सौंपी गई।
'संगठन सृजन अभियान' चलाकर जिला अध्यक्षों की नई नियुक्तियां हुईं और ब्लॉक से लेकर पंचायत स्तर तक समितियां भी गठित कर दी गईं। लेकिन, इन तमाम भारी-भरकम कवायदों के बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि पार्टी आज भी अपने सबसे बड़े संकट - 'कार्यकर्ताओं के भरोसे की कमी' से जूझ रही है।
प्रदेश कांग्रेस कमेटी (पीसीसी) भले ही यह दावा कर रही है कि संगठन अब पूरी तरह तैयार है और पहली बार पदाधिकारियों की सक्रियता का जमीनी सत्यापन भी कराया गया है, लेकिन हकीकत आंदोलनों के दौरान खुलकर सामने आ रही है। हाल ही में वरिष्ठ नेता मीनाक्षी नटराजन का राज्यसभा चुनाव का नामांकन निरस्त होने के विरोध में प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने आठ दिनों तक लगातार राज्य से लेकर जिला स्तर पर उग्र प्रदर्शन का एलान किया था।
युवा कांग्रेस, महिला कांग्रेस और छात्र इकाई एनएसयूआई (NSUI) को इस आंदोलन को धार देने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मगर नतीजा पूरी तरह ढाक के तीन पात रहा। प्रदर्शन इतने फीके और रस्मी थे कि राजधानी भोपाल में युवा कांग्रेस के प्रदर्शन में महज 12 से 15 कार्यकर्ता ही नजर आए।
पार्टी की रीढ़ मानी जाने वाली छात्र इकाई एनएसयूआई की स्थिति तो और भी चिंताजनक रही। प्रदेश के 21 जिलों में इस मुद्दे पर एक भी प्रदर्शन नहीं हुआ, जिसके बाद संगठन ने लापरवाह जिला अध्यक्षों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। दरअसल, इसके पीछे की वजह अंदरूनी राजनीति है। एनएसयूआई के नए चुनावों की घोषणा हो चुकी है और वर्तमान पदाधिकारियों को अच्छी तरह पता है कि उन्हें दोबारा मौका मिलने की उम्मीद कम है, इसलिए उन्होंने प्रदर्शनों में कोई खास रुचि नहीं दिखाई।
कांग्रेस केवल कार्यकर्ताओं की कमी से ही नहीं, बल्कि शीर्ष स्तर पर चल रहे गंभीर मतभेदों से भी कमजोर हो रही है। ताजा मामला प्रदेश के कद्दावर नेता दिग्विजय सिंह और प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी के बीच बढ़ती तनातनी का है। मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने के बाद बुलाई गई एक पत्रकार वार्ता में दोनों नेताओं के बीच के मतभेद खुलकर जनता के सामने आ गए। स्थिति यहां तक पहुंच गई कि दिग्विजय समर्थकों ने इसे सिंह के आत्मसम्मान से जोड़ते हुए खुलेआम चेतावनी दे डाली है कि इसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा।
फ्रंटल ऑर्गेनाइजेशन (युवा, महिला कांग्रेस और एनएसयूआई) प्रदेश कांग्रेस के सीधे नियंत्रण में नहीं आते हैं। इन्हें राज्य और जिला स्तर पर प्रदर्शन करने के स्पष्ट निर्देश दिए गए थे। कुछ जगहों पर प्रदर्शन कमजोर रहने की बात सामने आई है, जिसकी जांच संबंधित संगठन खुद कर रहे हैं। प्रदेश में हमारी टीम नई है। जिन जिलों में कार्यकर्ताओं की सक्रियता बेहद कम रही, वहां की स्थानीय इकाइयों से समीक्षा रिपोर्ट मांगी जाएगी। - संजय कामले, संगठन महामंत्री, प्रदेश कांग्रेस