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मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव जीतू पटवारी, हरीश चौधरी और उमंग सिंघार के लिए परीक्षा की घड़ी

भाजपा द्वारा राज्यसभा की तीसरी सीट पर चुनाव लड़ने से कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।

By Vaibhav ShridharEdited By: Prashant Pandey
Publish Date: Tue, 09 Jun 2026 08:18:52 AM (IST)Updated Date: Tue, 09 Jun 2026 08:23:08 AM (IST)
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मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव जीतू पटवारी, हरीश चौधरी और उमंग सिंघार के लिए परीक्षा की घड़ी
जीतू पटवारी, उमंग सिंघार और हरीश चौधरी की तस्वीर।

HighLights

  1. कांग्रेस ने प्रदेश के तीनों नेताओं को फ्री-हैंड देकर संगठन सृजन अभियान चलाया
  2. 2018 में जीत के बाद 2020 में सरकार गिरने से संगठन कमजोरी उजागर हुई
  3. पर्याप्त विधायक संख्या के बावजूद हार होती है तो जिम्मेदारी इन्हीं पर आएगी

वैभव श्रीधर, नईदुनिया, भोपाल। भाजपा के राज्यसभा की तीसरी सीट पर चुनाव लड़ने से कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। संगठन सृजन अभियान चलाकर जिस तरह से संगठन के सशक्तीकरण का दावा किया गया, उसकी पहली परीक्षा इस चुनाव में होगी।

वहीं, प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी, प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के लिए भी यह चुनाव किसी परीक्षा की घड़ी से कम नहीं है। तीनों को अपने आप को साबित करना होगा अन्यथा इनके भविष्य की राह कठिन हो सकती है, क्योंकि पार्टी ने तीनों को फ्री-हैंड दिया हुआ है।


प्रदेश में कांग्रेस को लगातार चुनाव में हार का सामना करना पड़ रहा है। 2018 के विधानसभा चुनाव में जीतने के बाद कमल नाथ के नेतृत्व में पार्टी की सरकार तो बनीं मगर यह डेढ़ वर्ष ही चल सकी और 2020 में अल्पमत में आ गई, तब संगठन की कमजोरी को बड़ा कारण माना गया और राहुल गांधी ने पीढ़ी परिवर्तन करते हुए इंदौर के राऊ विधानसभा क्षेत्र से चुनाव हारने के बाद भी जीतू पटवारी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया।

सभी नेताओं को फ्री-हैंड दिया गया है

विधानसभा में अजय सिंह, राजेंद्र कुमार सिंह, बाला बच्चन, लखन घनघोरिया सहित वरिष्ठ नेताओं के स्थान पर उमंग सिंघार को नेता प्रतिपक्ष बनाया। इतना ही नहीं, प्रदेश प्रभारी भी हरीश चौधरी को बनाया गया। इन सभी नेताओं को फ्री-हैंड दिया गया। संगठन सृजन अभियान चलाकर पूरी नई टीम खड़ी की गई और यह दावा किया गया कि जिन्हें पदाधिकारी बनाया गया, वे नेताओं के चहेते नहीं, कांग्रेसजन हैं। इसमें विधायकों की भी भूमिका रही।

राज्यसभा चुनाव बहुत महत्वपूर्ण

सभी प्रक्रिया में इन्हें सहभागी बनाया गया। अभी तक जो भी नाराजगी थी, वह छोटे-मोटे और स्थानीय विषयों को लेकर थी लेकिन राज्यसभा चुनाव काफी महत्वपूर्ण है। इसमें पार्टी यदि अपना उम्मीदवार जिताने में सफल रहती है तो इसे तीनों नेताओं के प्रबंधन की सफलता माना जाएगा लेकिन पर्याप्त सदस्य संख्या होने के बावजूद हार का सामना करना पड़ता है तो निश्चित ही ठीकरा भी इन्हीं पर फूटेगा और जिम्मेदारी भी लेनी होगी।

चुनाव में हार से गिरा है कार्यकर्ताओं का मनोबल

दरअसल, लगातार चुनाव में हार के कारण कार्यकर्ताओं का मनोबल पहले से गिरा हुआ है, ऐसे में फिर हार, वो भी पार्टी विधायकों के पाला बदलने के कारण होती है तो उसका असर आगामी चुनावों की तैयारियों पर भी पड़ेगा। प्रदेश में 2027 से चुनावों का सिलसिला प्रारंभ हो जाएगा।

सबसे पहले नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव होंगे। निकाय चुनाव दलीय आधार पर होते हैं। इसके परिणाम एक साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए वातावरण बनाते हैं। यही कारण है कि राज्यसभा के चुनाव को तीनों नेताओं के लिए परीक्षा की घड़ी माना जा रहा है।

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