
नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। लेखक एवं समाजसेवी पद्मश्री कैलाशचंद्र पंत का निधन शुक्रवार को हो गया। उनके निधन पर साहित्य एवं कला जगत में शोक व्याप्त हो गया है। पद्मश्री व राष्ट्रीय शरद जोशी सम्मान से अलंकृत पंत ने अपने दीर्घ सार्वजनिक जीवन में निष्पक्ष पत्रकारिता, उत्कृष्ट लेखन व समाजसेवा के माध्यम से जो अमूल्य योगदान दिया, वह सदैव स्मरणीय रहेगा।
उनका जन्म 26 अप्रैल 1936 को महू (इंदौर) में हुआ था। इन्होंने एमए साहित्याचार्य एवं साहित्य रत्न की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन लेखन, संपादन एवं सामाजिक कार्यों को समर्पित किया।
कैलाशचंद्र पंत ने हिंदी पत्रकारिता एवं साहित्य को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी कौन किसका आदमी, धुंध के आर-पार, शब्द का विचार पक्ष, संस्कार, संस्कृति और समाज, संकल्प की प्रतीक्षा में जैसी कृतियां विशेष रूप से चर्चित रही हैं। इन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा पर दो पुस्तकों का संपादन भी किया है, जिनमें भारतीय ज्ञान परंपरा : समय, समस्या और समाज (प्रथम खंड) व भारतीय ज्ञान परंपरा : अपनी अस्मिता तलाशने की आकांक्षा (द्वितीय खंड) शामिल हैं।
पत्रकारिता के क्षेत्र में भी इनका सफर एक व्याख्याता के रूप में प्रारंभ हुआ, जिसके बाद आपने विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं में बतौर संपादक कार्य किया। वह साप्ताहिक जनधर्म (1977-1998) के संपादक रहे। साथ ही वर्ष 2006 से 2021 तक मासिक पत्रिका अक्षरा का संपादन भी किया।
यह हम सबका सौभाग्य था कि मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति और हिंदी भवन न्यास को अनेक वर्षों से पद्मश्री कैलाशचंद्र पंत का सानिध्य प्राप्त होता रहा। उनके द्वारा लिखे गए आलेखों के अनेक संग्रह पुस्तक आकार में प्रकाशित होकर हिंदी भवन न्यास की धरोहर बन चुके हैं।
अक्षरा के संपादक एवं मप्र राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के मंत्री संचालक डॉ. विकास दवे कहते हैं कि दादा ने देश, समाज, भाषा और साहित्य को इतना कुछ दिया है कि उनके इस ऋण से हम सब कभी भी उऋण नहीं हो सकते। वरिष्ठ साहित्यकार एवं महासचिव लघुकथा शोध केंद्र समिति भोपाल घनश्याम मैथिल अमृत ने कहा कि पद्मश्री कैलाशचंद पंत की उपस्थिति में सकारात्मकता थी, अपनेपन का अहसास था।