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करोड़ों का बजट, फिर भी थाली में खराब खाना; MP के आदिवासी छात्रावासों में परेशान छात्राएं 8km पैदल कलेक्ट्रेट पहुंचीं

मध्यप्रदेश के आदिवासी छात्रावासों में पर्याप्त बजट और सरकारी सहायता के बावजूद भोजन की गुणवत्ता और व्यवस्थाओं पर सवाल उठ रहे हैं।

By Digital DeskEdited By: Akash Sharma
Publish Date: Fri, 21 Aug 2026 08:14:12 PM (IST)Updated Date: Fri, 21 Aug 2026 08:14:12 PM (IST)
करोड़ों का बजट, फिर भी थाली में खराब खाना; MP के आदिवासी छात्रावासों में परेशान छात्राएं 8km पैदल कलेक्ट्रेट पहुंचीं
खराब भोजन और अव्यवस्था के खिलाफ आदिवासी छात्रावासों में बढ़ा आक्रोश (AI Generated Image)

HighLights

  1. 1,083 आश्रम छात्रावासों में करीब 80 हजार विद्यार्थी पढ़ते हैं
  2. भोजन सामग्री पर प्रतिमाह 14.23 करोड़ रुपये खर्च होते हैं
  3. शहडोल की छात्राएं आठ किमी पैदल कलेक्ट्रेट पहुंचीं

राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, भोपाल। सरकारी संस्थानों में अव्यवस्था के पीछे अक्सर बजट की कमी को कारण माना जाता है, लेकिन मध्यप्रदेश के आदिवासी छात्रावासों में तस्वीर इसके उलट है। यहां प्रति छात्र-छात्रा प्रतिमाह 1,740 रुपये का मैस बजट निर्धारित है और सरकार अनाज भी अलग से उपलब्ध कराती है। इसके बावजूद कई छात्रावासों में घटिया भोजन, खाने में कीड़े और दूषित पेयजल की शिकायतें सामने आ रही हैं।

डेढ़ लाख से अधिक विद्यार्थी ले रहे आवासीय शिक्षा

प्रदेश में 1,544 शासकीय कन्या छात्रावास संचालित हैं। सभी श्रेणियों के कन्या छात्रावासों में कुल 81,804 सीटें स्वीकृत हैं। प्राथमिक स्तर के बच्चों के लिए विभाग 1,083 आश्रम छात्रावास भी संचालित करता है, जहां करीब 80 हजार विद्यार्थी पढ़ रहे हैं। इस तरह छात्रावासों में डेढ़ लाख से अधिक छात्र-छात्राएं आवासीय शिक्षा ले रहे हैं।


इन छात्रावासों में केवल भोजन सामग्री, जैसे तेल, मसाला और सब्जी पर प्रतिमाह 14.23 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। यह राशि सालाना करीब 142.34 करोड़ रुपये है। वहीं वित्तीय वर्ष 2026-27 में आदिवासी कल्याण के लिए 47,429 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जो राज्य बजट का लगभग 25.8 प्रतिशत है।

वेंडर और प्रशासन की भूमिका पर सवाल

प्रारंभिक जांच में गड़बड़ियों के पीछे स्थानीय स्तर पर वेंडर और प्रशासन के बीच अनैतिक गठजोड़ की आशंका सामने आई है। आरोप है कि कुछ मेस वेंडर घटिया सामग्री पहुंचाते हैं और वार्डन या स्थानीय अधिकारी कमीशनखोरी के चलते अनदेखी करते हैं।

सरकार के 1,740 रुपये मुख्य रूप से कच्ची राशन सामग्री, तेल, सब्जी और ईंधन के लिए होते हैं। गेहूं-चावल सार्वजनिक वितरण प्रणाली से अलग मिलता है। इस दोहरी व्यवस्था में खराब गुणवत्ता के अनाज की आपूर्ति की आशंका भी जताई गई है।

बालाघाट से शहडोल तक छात्राओं का विरोध

अव्यवस्था और वार्डन-अधीक्षिका के खराब व्यवहार से परेशान छात्राओं ने बालाघाट कलेक्ट्रेट पहुंचकर प्रदर्शन किया। शहडोल के धुरवार आदिवासी कन्या छात्रावास की छात्राएं घटिया भोजन और अव्यवस्था के विरोध में आठ किमी पैदल चलकर कलेक्ट्रेट पहुंचीं। कलेक्टर पार्थ जायसवाल ने जांच और कार्रवाई का आश्वासन दिया, जिसके बाद छात्राएं लौट गईं। छिंदवाड़ा और खंडवा में भी इसी तरह की शिकायतें सामने आई हैं।

जेन जी आंदोलन का असर

दिल्ली के जंतर-मंतर में पिछले दिनों हुए जेन जी आंदोलन का प्रभाव अब ग्रामीण क्षेत्रों में भी दिखाई देने लगा है। आंदोलन ने सुदूर क्षेत्रों के विद्यार्थियों और युवाओं को अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने की प्रेरणा दी है। हालांकि, कुछ स्थानों पर अराजक तत्वों के शामिल होने की बात भी सामने आई है।

एसटी छात्रावासों में भोजन से लेकर अन्य सुविधाएं बेहतर देने का प्रयास है। बजट की कहीं कोई समस्या नहीं है। निगरानी के लिए छात्रावास अधीक्षक से लेकर अधिकारी स्तर पर भी व्यवस्था बनाई है। पालक शिक्षक संघ भी हैं। पूरे प्रदेश में इसकी बैठकें करवा रहे हैं ताकि जो थोड़ी-बहुत कमियों की बात सामने आती है, उसका भी समाधान स्थानीय स्तर पर बेहतर व्यवस्था के साथ कर लिया जाए।

-गुलशन बामरा, प्रमुख सचिव, जनजातीय कार्य विभाग, मध्य प्रदेश