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73 पत्रिकाओं से शुरू हुआ सफर, अब बना पांच करोड़ पन्नों का वटवृक्ष, गुजरे जमाने की धड़कनें सुनाता है भोपाल का 'सप्रे संग्रहालय'

क्या आपने कभी ऐसा महसूस किया है कि आप वर्तमान में खड़े होकर सीधे इतिहास के झरोखे में झांक रहे हों? देश के दिल कहे जाने वाले भोपाल में एक ऐसी जगह है, जह...और पढ़ें

By Sushil PandeyEdited By: Mohan Kumar
Publish Date: Sat, 30 May 2026 01:09:15 PM (IST)Updated Date: Sat, 30 May 2026 01:10:56 PM (IST)
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73 पत्रिकाओं से शुरू हुआ सफर, अब बना पांच करोड़ पन्नों का वटवृक्ष, गुजरे जमाने की धड़कनें सुनाता है भोपाल का 'सप्रे संग्रहालय'
'सप्रे संग्रहालय' की अलमारियों में बंद है देश के बनने की दास्तान (फोटो- sapresangrahalaya)

HighLights

  1. हिंदी पत्रकारिता की यात्रा को संजोए है सप्रे संग्रहालय
  2. अलमारियों में बंद है देश के बनने की दास्तान
  3. दो कालखंडों में सिमटा इतिहास और शोध का केंद्र

नवदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। क्या आपने कभी ऐसा महसूस किया है कि आप वर्तमान में खड़े होकर सीधे इतिहास के झरोखे में झांक रहे हों? देश के दिल कहे जाने वाले भोपाल में एक ऐसी जगह है, जहां कदम रखते ही वक्त के पहिए थम जाते हैं और सदियों पुराना इतिहास पन्नों पर मुस्कुराता हुआ नजर आता है। इस अनूठे स्थान का नाम है- ''माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान''।

इसे केवल एक संग्रहालय कहना इसके साथ नाइंसाफी होगी, वास्तव में यह देश की राष्ट्रीय बौद्धिक धरोहर का एक ऐसा महासागर है, जिसे विद्वानों ने ''ज्ञानतीर्थ'' की संज्ञा दी है। हिंदी पत्रकारिता दिवस के मौके पर हम सप्रे संग्रहालय के बारे में बता रहे हैं।


कमलापति महल के बुर्ज से राष्ट्रीय गौरव तक का सफर

लिंक रोड नंबर तीन पर पत्रकार कॉलोनी के सामने स्थित इस संस्थान की कहानी किसी ऐतिहासिक चमत्कार से कम नहीं है। 19 जून, 1984 को हिंदी नवजागरण के अग्रदूत माधवराव सप्रे की 114वीं जयंती पर इस संस्थान की नींव रखी गई थी।

वरिष्ठ पत्रकार विजयदत्त श्रीधर ने लगभग चार दशक पहले भोपाल के ऐतिहासिक कमलापति महल के एक पुराने बुर्ज से मात्र 73 पत्र-पत्रिकाओं के साथ इस यात्रा की शुरुआत की थी। विपरीत परिस्थितियों में बोया गया वह छोटा सा बीज आज एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है। इसकी स्थापना के लिए विजयदत्त श्रीधर को वर्ष 2012 में पद्मश्री सम्मान से भी नवाजा जा चुका है।

संग्रहालय को केंद्र, राज्य सरकार और निजी क्षेत्र के कई अन्य पुरस्कार भी मिले हैं। संग्रहालय की स्थापना के इस वर्ष 19 जून को 42 साल पूरे हो जाएंगे। इस संस्थान के बारे में मूर्धन्य संपादक और राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने कभी कहा था- "हिंदी इलाकों में संस्थानों के क्षय का हम रोना रोते रहते हैं, पर विजयदत्त श्रीधरजी ने एक ऐसी संस्था बनाई है, जिस पर पूरा देश फक्र करेगा।"

अलमारियों में बंद है देश के बनने की दास्तान

आज इस संग्रहालय में 30,000 से अधिक समाचार पत्र शीर्षक व पत्रिकाएं और लगभग पांच करोड़ संदर्भ पृष्ठों का विशाल खजाना मौजूद है। यहां सिर्फ अखबार नहीं, बल्कि भारत के बनने की पूरी कहानी दर्ज है। इसी प्रकार अलग-अलग विषयों पर पौन दो लाख किताबें मौजूद हैं, विज्ञान, आर्ट और वणिज्य से जुड़ी संदर्भ सामग्री है। जर्जर 27 लाख पन्नों की डिजिटलीकरण हो चुका है।

यहां की कुछ बेहद दुर्लभ सामग्रियां इस प्रकार हैं-

ऐतिहासिक अखबार: आधुनिक भारत का पहला अखबार ''हिक्कीज बंगाल गजट'' यहां पूरी तरह सुरक्षित है। इसके अलावा हिंदी का पहला अखबार ''उर्दंड मार्तंड'', ''भारत भ्राता'', ''मालवा अखबार'' और ''अखबार ग्वालियर'' जैसी दुर्लभ प्रतियां इतिहास के उस दौर की गवाही देती हैं जब देश में पत्रकारिता का जन्म हो रहा था।

अनोखा संग्रह: हिंदुस्तान से प्रकाशित अब तक के सबसे छोटे और सबसे बड़े आकार के समाचार पत्र की प्रतियां भी यहां आने वाले लोगों के कौतूहल का केंद्र बनती हैं।

दस्तावेज और पत्राचार: आजादी के पुरोधाओं और महान नेताओं के बीच हुए ऐतिहासिक पत्र-व्यवहार तथा दुर्लभ सरकारी गजट और पांडुलिपियां भी यहां सहेज कर रखी गई हैं।

दो कालखंडों में सिमटा इतिहास और शोध का केंद्र

शोधार्थियों की सहूलियत के लिए इस संग्रहालय के शोध विभाग को वैज्ञानिक पद्धति से दो मुख्य कालखंडों में विभाजित किया गया है। प्रथम खंड में भारतीय पत्रकारिता की शुरुआत से लेकर वर्ष 1920 तक के दुर्लभ प्रकाशन। द्वितीय खंड में वर्ष 1920 के बाद से लेकर आधुनिक दौर तक की सामग्री है।

इस सुव्यवस्थित ज्ञानकोश का ही परिणाम है कि अब तक देश-विदेश के 1,251 से अधिक शोधार्थी यहां से डी.लिट, पीएचडी और एमफिल की उपाधियां अर्जित कर चुके हैं। इसके अलावा 500 से अधिक शिक्षा, साहित्य और पत्रकारिता से जुड़े रचनाधर्मी रोज इस ज्ञानकुंड से अपनी जिज्ञासा शांत कर रहे हैं।

हर वर्ष होते हैं आयोजन

पत्रकारों के सम्मान समारोह, पुस्तक लोकर्पण और समय- समय पर बौद्धिक आयोजन यहां होते रहते हैं। स्थापना दिवस के अतिरिक्त साल में छह से आठ कार्यक्रम हर वर्ष होते हैं।लोगों ने अपने पूर्वजों की बौद्धिक विरासत भी संग्रहालय में सौंपी है। आने वाली पीढ़ियों के लिए अमानत को सहेजा है।

संग्रहालय के संस्थापक- निदेशक विजयदत्त श्रीधर कहते हैं कि भारत में पत्रकारिता का विकास सामाजिक और राजनीतिक नवजागरण के साथ हुआ है। आर्थिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक बदलावों के प्रामाणिक स्रोत इन समकालीन पन्नों में आज भी जिंदा हैं। किसी पुराने वक्त के समाचार पत्रों की इबारत को पढ़ते हुए सीधे इतिहास से रूबरू हुआ जा सकता है। यह आने वाली पीढ़ियों की अमानत है, जिसे सहेज कर रखना हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है।

यह भी पढ़ें- जब कलकत्ता से निकला 'उदन्त-मार्त्तण्ड' और इंदौर बना 'पत्रकारिता की राजधानी', हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों के सफर की पूरी कहानी

हिंदी पत्रकारिता के दौ सौ वर्ष पूरे के मौके पर यह संग्रहालय हमें याद दिलाता है कि शब्द कभी मरते नहीं हैं। यदि आपको भी इतिहास को करीब से महसूस करना है, तो भोपाल का यह ''''ज्ञानतीर्थ'''' आपका स्वागत करने के लिए तैयार है। सप्रे संग्रहालय की राष्ट्रीय और बौद्धिक विरासत आने वाली पीढ़ी के लिए विरासत है। शोर्धार्थियों के लिए यह रिसर्च सेंटर के समान है। दुनिया भर के शोधार्थी आते हैं। आगे चलकर यह इंटर्नशिप का बड़ा सेंटर बनेगा, खासतौर से मीडिया हाउस और मानविकी संकाय के लिए।