
नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। हमीदिया अस्पताल में 16 करोड़ रुपये की लागत से तैयार हो रही मध्य प्रदेश की दूसरी सरकारी बोन मैरो ट्रांसप्लांट (बीएमटी) यूनिट इस साल भी शुरू नहीं हो पाएगी। अस्पताल प्रबंधन ने पहले इस वर्ष इलाज शुरू होने की उम्मीद जताई थी, लेकिन उपकरणों की खरीदी का टेंडर अब तक जारी नहीं होने से मरीजों को लंबा इंतजार करना पड़ेगा।
ब्लाक-2 की चौथी मंजिल पर बन रही यह हाईटेक यूनिट अब 2026 के अंत या 2027 की शुरुआत में शुरू होने की संभावना है। इससे थैलेसीमिया सहित कई गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों की उम्मीदों को झटका लगा है।
अंतरराष्ट्रीय मानकों पर बन रही यूनिट
बीएमटी यूनिट को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार विकसित किया जा रहा है। यहां एचईपीएल फिल्टर युक्त आइसोलेशन रूम, एडवांस आईसीयू, 6 से 8 विशेष बेड, लैमिनार एयर फ्लो सिस्टम, पॉजिटिव प्रेशर रूम और अत्याधुनिक इन्फेक्शन कंट्रोल सुविधाएं उपलब्ध होंगी।
इस यूनिट में थैलेसीमिया के अलावा सिकल सेल एनीमिया, ल्यूकेमिया और अप्लास्टिक एनीमिया के मरीजों का बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया जाएगा। इसके लिए डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ का प्रशिक्षण भी पूरा हो चुका है।
यूनिट शुरू होने के बाद मरीजों को बड़ी राहत मिलेगी। वर्तमान में निजी अस्पतालों में बोन मैरो ट्रांसप्लांट पर 25 से 30 लाख रुपये तक खर्च आता है, जबकि हमीदिया में यही इलाज डेढ़ से दो लाख रुपये में उपलब्ध हो सकेगा।
प्रदेश में थैलेसीमिया के 2 हजार से अधिक पंजीकृत मरीज हैं। इनमें करीब 1800 मरीज हर महीने ब्लड ट्रांसफ्यूजन पर निर्भर हैं। थैलेसीमिया का स्थायी इलाज बोन मैरो ट्रांसप्लांट ही माना जाता है, लेकिन यूनिट में देरी के कारण मरीजों को दिल्ली और मुंबई के बड़े अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है।
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पहले बीएमटी यूनिट को हमीदिया के ब्लाक-1 या नई बिल्डिंग में बनाने की चर्चा थी, लेकिन अस्पताल प्रबंधन ने स्पष्ट किया है कि इसका संचालन ब्लाक-2 की चौथी मंजिल से ही किया जाएगा।
बीएमटी यूनिट का सिविल वर्क लगभग पूरा हो चुका है। एचईपीएल फिल्टर और अन्य हाई-एंड उपकरणों की खरीदी के लिए टेंडर प्रक्रिया चल रही है। उपकरण मिलने और इंस्टालेशन के बाद ही यूनिट शुरू हो पाएगी। हमारा प्रयास है कि 2026 के अंत इसकी शुरुआत हो जाए। जिससे मरीजों को यह सुविधा मिल जाए।- डॉ. सुनीत टंडन, अधीक्षक, हमीदिया अस्पताल।