
राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, भोपाल। प्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने से पहले सरकार द्वारा गठित उच्च स्तरीय समिति ने सोमवार को भोपाल स्थित प्रशासन अकादमी में सुबह साढ़े दस बजे से देर शाम तक राज्य स्तरीय सुनवाई की। इसमें संस्थाओं, शासकीय विभागों, राजनीतिक दल, धर्मगुरुओं सहित विभिन्न आयोगों के प्रतिनिधियों से उनका पक्ष जाना।
इसमें आदिवासियों को अन्य प्रांतों की तरह यूसीसी के दायरे से बाहर रखने और मतांतरित होने वालों पर कानून लागू किए जाने का प्रावधान रखे जाने की बात सामने आई। इसके पीछे यह तर्क दिया गया कि मतांतरण के बाद परंपराएं बदल जाती हैं। उधर, लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर अधिकतर का मत रहा कि इसे मान्यता नहीं दी जानी चाहिए।
समिति का प्रयास है कि 30 जून तक विधेयक का प्रारूप तैयार कर सरकार को सौंप दिया जाए। सरकार की मंशा 20 जुलाई से प्रारंभ होने वाले विधानसभा के मानसून सत्र में इसे प्रस्तुत करने की है। राज्य स्तरीय सुनवाई में समिति के सदस्य सेवानिवृत्त मुख्य सचिव शत्रुघ्न सिंह, शिक्षाविद् गोपाल शर्मा, डॉ. शोभा पैठणकर, वरिष्ठ अधिवक्ता अनूप नायर और समाजसेवी बुद्ध पाल सिंह ने सुझाव सुने।
पूर्व न्यायाधीश मोहन पी. तिवारी ने आदिवासियों और लिव-इन रिलेशनशिप के साथ विवाह की आयु को लेकर बात रखी। उन्होंने कहा कि विवाह विच्छेद के मामले में अनावश्यक विलंब नहीं होना चाहिए। जब पति-पत्नी एक दिन साथ नहीं रह पाते हैं तो उस प्रकरण को न्यायालय में लंबा नहीं खींचना चाहिए। विवाह की न्यूनतम आयु लड़के के लिए 24 और लड़की के लिए 21 वर्ष रहे। भरण-पोषण कानून में भी एकरूपता रहनी चाहिए। हिंदू, मुस्लिम और ईसाई के अलग-अलग कानून हैं।
आदिवासियों को लेकर कहा कि नियम स्पष्ट होने चाहिए क्योंकि आदिवासी अब आदिवासी नहीं रह गए हैं। आईएएस, आईपीएस बन गए हैं। ब्राह्मण व ऊंची जातियों के बच्चों से विवाह कर रहे हैं, फिर भी आदिवासी हैं।
वहीं, अनुसूचित जनजाति आयोग के सदस्य भगत सिंह नेताम ने कहा कि अन्य राज्यों ने यूसीसी से अनुसूचित जनजातियों को बाहर रखा है। प्रदेश में भी ऐसा ही हो क्योंकि इन्हें यूसीसी में शामिल किया तो उनकी सांस्कृतिक प्रथाएं छिन्न-भिन्न हो जाएंगी। मतांतरित आदिवासियों को यूसीसी के दायरे में रखा जाना चाहिए। इन्हें विशेष हितलाभ देना उचित नहीं।
वनवासी कल्याण आश्रम के एस.एस. कुमरे ने इस बात पर जोर दिया कि आदिवासी समाज की लड़की अगर दूसरी जाति में विवाह करती है, तो उस पर यूसीसी लागू हो। इस पर समिति के सदस्य शत्रुघ्न सिंह ने पलटकर पूछा कि घर जमाई लड़का हो तो उस पर यूसीसी लागू होना चाहिए या नहीं।
आयुक्त जनजातीय तरुण राठी ने कहा कि उत्तराखंड, गुजरात और असम के यूसीसी में आदिवासियों को अलग रखा गया है। संविधान में अनुसूचित जनजाति वर्ग को जो अधिकार दिए गए हैं, यूसीसी लागू होने पर उन पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
उधर, विद्युत नियामक आयोग के कार्यवाहक अध्यक्ष गोपाल श्रीवास्तव ने कहा कि आदिवासियों के रीति-रिवाज सिद्ध ही नहीं हो पाते हैं। राजभवन के जनजातीय प्रकोष्ठ की दीपमाला रावत ने कहा कि महिला अंतरजातीय विवाह करे तो उसे लाभ न मिले, लेकिन पुरुष ऐसा करे तो उसके संबंध में ऐसा क्यों नहीं, इस पर बात होनी चाहिए।
महिला आयोग की सदस्य साधना स्थापक ने कहा कि यूसीसी में हमारी जाति भारतीय होना चाहिए। लिव-इन रिलेशनशिप पर अलग से चर्चा होनी चाहिए। कम उम्र में बच्चे गलत निर्णय ले लेते हैं। इस मुद्दे पर अलग से समिति होनी चाहिए।
सचिव सुरेश तोमर ने कहा कि यूसीसी की सफलता, नए कानून बनाने पर कम, डिजिटल गवर्नेंस, आसान न्याय, कानूनी जागरूकता, जवाबदेही के तरीके और कमजोर के लिए विशेष सहयोग के द्वारा अच्छे से लागू करने पर निर्भर करेगी।
वहीं, आईजी इंटेलिजेंस डॉ. आशीष ने कहा कि विदेश में विवाह करते हैं तो प्रदेश में भी पंजीकरण होना चाहिए। निजी विश्वविद्यालय आयोग के अध्यक्ष खेम सिंह डहरिया और महेशचंद्र चौधरी ने छात्र-छात्राओं के हितों की बात उठाई।
यूसीसी में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर धार्मिक-सामाजिक संगठनों के अधिकतर प्रमुखों ने यूसीसी में मान्यता नहीं देने का सुझाव रखा है। हिंदू उत्सव समिति के अध्यक्ष चंद्रशेखर तिवारी ने भी कहा कि यूसीसी में लिव-इन रिलेशन को मान्यता नहीं दी जानी चाहिए।
शहर काजी मुश्ताक अली ने कहा कि हम कानून को बनाने वाले नहीं, बताने वाले हैं। हमारा कानून कुरान हदीस है। लिव-इन रिलेशन को मान्यता देने का उन्होंने भी विरोध करते हुए कहा कि बिना निकाह किसी लड़की को साथ रखना तो दूर, देखना भी गुनाह है। यदि यह कानून लाया जाता है तो सामाजिक ताना-बाना बिखर जाएगा। जो बच्चा पैदा होगा वह किसका कहलाएगा? कौन परवरिश करेगा? यूसीसी की अभी जरूरत ही नहीं है।
कैथोलिक क्रिश्चियन कमेटी के आर्च बिशप ए.ए.एस. दुराई राज ने कहा कि विविधता में एकता बरकरार रखना जरूरी है। बौद्ध धर्म गुरु भन्ते शाक्यपुत्र सागर थेरो ने कहा कि समान नागरिक संहिता बनाने में भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता का पूरा सम्मान किया जाए। बौद्ध धर्म की धार्मिक स्वतंत्रता संविधान के अनुरूप सुरक्षित रखनी चाहिए। यह कानून की जरूरत इसके पहले क्यों पड़ी, इसके पहले क्यों नहीं पड़ी?