
डिजिटल डेस्क, भोपाल। क्या कोई ऐसी डिग्री हो सकती है जिसे पूरी दुनिया 'सैल्यूट' करे, लेकिन रोजगार के बाजार में उसकी कोई कीमत न हो? मध्य प्रदेश में योग के साथ आज कुछ ऐसा ही हो रहा है। सूबे के स्कूलों में सुबह-सुबह चटाई बिछाकर अनुलोम-विलोम करते लाखों बच्चों की तस्वीरें जितनी सुखद हैं, उच्च शिक्षा में योग कोर्सेज का खाली रह जाना उतना ही डरावना।
यह कहानी सिर्फ खाली सीटों के आंकड़ों की नहीं है, बल्कि उस भरोसे के टूटने की है जो युवाओं ने इस प्राचीन विधा को अपना 'करियर' मानकर जताया था। आज जब प्राइवेट सेक्टर्स में योग ट्रेनर्स की व्यक्तिगत कमाई का ग्राफ ऊपर जा रहा है, तब सरकारी यूनिवर्सिटीज का यह सूनापन चीख-चीख कर कह रहा है कि युवा सिर्फ 'योग का सर्टिफिकेट' नहीं, बल्कि 'रोटी और सुरक्षा की गारंटी' चाहता है।
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल और आसपास के चार प्रमुख सरकारी विश्वविद्यालयों के आंकड़े इस कड़वे सच को बयां करते हैं। बरकतउल्ला यूनिवर्सिटी (BU), माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (MCU), अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय और सांची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय में योगिक साइंस, पीजी डिप्लोमा और डिग्री कोर्सेज की कुल मिलाकर 330 सीटें हैं। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि वर्तमान सत्र में इनमें से महज 175 सीटों पर ही दाखिले हो सके हैं। यानी लगभग 47% सीटें पूरी तरह खाली रह गईं।
अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय की स्थिति तो और भी चिंताजनक है, जहां 100 सीटों में से सिर्फ 23 विद्यार्थी ही योग की पढ़ाई करने पहुंचे। यानी कुल सीटों का सिर्फ 23 प्रतिशत। माखनलाल और सांची यूनिवर्सिटी में भी कमोबेश यही हाल है, जहां पीजी डिप्लोमा की सीटें भरने के लिए तरस रही हैं।
योग कोर्सेज की सीटें खाली रहने की सबसे बड़ी वजह सरकारी क्षेत्र में नौकरियों का न होना है। केंद्रीय विद्यालयों या कुछ चुनिंदा जगहों पर योग शिक्षकों की नियुक्तियां होती भी हैं, तो वे महज कुछ महीनों के लिए 'संविदा' या 'अतिथि शिक्षक' के रूप में होती हैं, जहां मानदेय बेहद कम होता है।
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हालांकि, प्राइवेट सेक्टर, फिटनेस सेंटर्स और कॉरपोरेट वर्ल्ड में योग ट्रेनर्स की व्यक्तिगत कमाई निजी तौर पर 20,000 से 50,000 प्रति माह तक बढ़ी है, लेकिन सरकारी नौकरियों की सुरक्षा न होने के कारण छात्र इस रिस्क को लेने से कतरा रहे हैं।