
नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। बदलती जीवनशैली और खान-पान की गलत आदतों का सबसे बुरा असर अब बच्चों की मुस्कान पर दिख रहा है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़े के अनुसार मध्य प्रदेश में पांच से 12 वर्ष तक की आयु के लगभग 65 प्रतिशत बच्चे दांतों की कैविटी (सड़न) से जूझ रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों में शुगर, चॉकलेट, कोल्ड ड्रिंक और जंक फूड का बढ़ता मोह उनके दांतों को समय से पहले खोखला कर रहा है।
राजधानी के गांधी मेडिकल कॉलेज (जीएमसी) के विशेषज्ञों द्वारा किए गए अध्ययन में यह बात निकलकर आई है कि छह से 14 वर्ष की आयु के 73.3 प्रतिशत स्कूली बच्चे डेंटल कैविटी (दांतों की सड़न) से जूझ रहे हैं।
क्लीनिकल परीक्षण में 386 बच्चों को शामिल किया गया था। बच्चों की ओरल हाइजीन और गलत आदतें दांतों को समय से पहले खराब कर रही हैं।
अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष रात में सोने से पहले ब्रश करने की आदत को लेकर है। शोध में पाया गया कि जो बच्चे रात में ब्रश नहीं करते, उनमें दांतों की सड़न और मसूड़ों की समस्या उन बच्चों की तुलना में कहीं अधिक है जो दिन में दो बार सफाई करते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, रात भर दांतों के बीच फंसे अन्न के कण बैक्टीरिया को पनपने का मौका देते हैं, जो सुरक्षा परत (इनेमल) को तेजी से नष्ट करते हैं।
कैविटी के अलावा ये बीमारियां भी मिलीं
दांतों का रंग बदलना - 8.5% बच्चों में।
दांतों का टेढ़ापन - 6.7% बच्चे।
मसूड़ों में सूजन - 6.5% बच्चों में।
मुह के छाले - 3.1% बच्चों में।
केवल बच्चे ही नहीं, वयस्क भी ओरल हेल्थ के प्रति लापरवाह हैं। रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश के करीब 39 प्रतिशत पुरुष तंबाकू के आदी हैं। यही वजह है कि मध्य प्रदेश अब ओरल कैंसर के हॉटस्पॉट के रूप में उभर रहा है। तंबाकू और गुटखे का सेवन न केवल दांतों को काला और कमजोर बना रहा है, बल्कि यह जानलेवा कैंसर की मुख्य वजह भी बन रहा है।
प्रदेश के धार और झाबुआ जैसे जिलों में समस्या और भी गंभीर है। यहां के भू-जल में फ्लोराइड की अधिकता डेंटल फ्लोरोसिस का कारण बन रही है। इसके चलते बच्चों और युवाओं के दांत पीले पड़कर समय से पहले ही टूटने लगे हैं। यह एक ऐसी समस्या है जिसका समाधान केवल डॉक्टरी इलाज नहीं, बल्कि स्वच्छ पेयजल भी है।
यह हो तो आएगा बदलाव
स्कूलों में नियमित अंतराल पर दंत परीक्षण शिविर लगाए जाने चाहिए।
बच्चों को रात में ब्रश करने के महत्व के बारे में स्कूल और घर दोनों जगह शिक्षित किया जाए।
शुरुआती लक्षणों जैसे काले धब्बे या ठंडे-गर्म की सेंसिटिविटी को पहचानकर तत्काल इलाज कराएं।
फैक्ट फाइल - आंकड़ों में प्रदेश की स्थिति
65% - बच्चे (5-12 वर्ष) दांतों की सड़न से प्रभावित।
39% - पुरुष आबादी प्रदेश में तंबाकू की आदी।
हॉटस्पॉट - धार, झाबुआ (फ्लोरोसिस के लिए) और भोपाल-इंदौर (कैविटी के लिए)।
'बच्चों में डेंटल कैविटी एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बन चुकी है। रात में ब्रश करने की आदत एक ऐसा गेम चेंजर बदलाव है जो बच्चों के दांतों को ताउम्र स्वस्थ रख सकता है। स्कूलों में नियमित स्क्रीनिंग और अभिभावकों की जागरूकता से ही इस स्थिति को सुधारा जा सकता है।
ओरल हेल्थ सीधे तौर पर हृदय रोग और डायबिटीज से जुड़ी है, इसलिए साल में कम से कम एक बार डेंटल चेकअप और दिन में दो बार ब्रशिंग करना ही चाहिए।' - डॉ. अनुज भार्गव, विभागाध्यक्ष, डेंटल सर्जरी विभाग, जीएमसी भोपाल
'दांतों की सेहत सीधे तौर पर बच्चों के पोषण और शारीरिक विकास से जुड़ी है। कैविटी के कारण बच्चा सही से खाना नहीं चबा पाता, जिसका असर उसके डाइजेशन और पढ़ाई पर भी पड़ता है। दांतों की समस्याओं को शुरुआती स्टेज में पहचानना जरूरी है ताकि भविष्य में होने वाली जटिलताओं से बचा जा सके।' - डॉ. राजेश टिक्कस, वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ, जीएमसी भोपाल