
नईदुनिया प्रतिनिधि, धार। भोजशाला में रविवार को आस्था, इतिहास और लंबे संघर्ष का ऐसा संगम दिखाई दिया, जिसे हिंदू संगठनों ने ‘सनातन पुनर्जागरण’ की ऐतिहासिक शुरुआत बताया। हाई कोर्ट के फैसले और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा वर्षभर निर्बाध पूजा की अनुमति दिए जाने के बाद पहली बार मां वाग्देवी के प्रतीकात्मक स्वरूप की स्थापना की गई।
सुबह से ही परिसर जय मां वाग्देवी, राजा भोज अमर रहें और वैदिक मंत्रोच्चार से गूंज उठा। हजारों श्रद्धालु ढोल-नगाड़ों, बैंड-बाजों और धर्मध्वजाओं के साथ पहुंचे। महिलाएं कलश लेकर शामिल हुईं, जबकि युवा और बच्चे हाथों में भगवा ध्वज तथा मां वाग्देवी के चित्र लिए दिखे।
हिंदू संगठनों के अनुसार वर्ष 1305 में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के बाद यह पहला अवसर है, जब भोजशाला में इस स्वरूप में मां वाग्देवी की स्थापना हुई है। वाग्देवी की प्रतिकृति को भीतर ले जाने को लेकर एएसआई की अनुबंधित सुरक्षा एजेंसी ने आपत्ति जताई। अधिकारियों से चर्चा के बाद अनुमति दी गई।
भोजशाला में स्थापित मां वाग्देवी के प्रतीकात्मक स्वरूप (कटआउट) को अब प्रतिदिन हटाया नहीं जाएगा। अब यह स्वरूप स्थायी रूप से परिसर में स्थापित रहेगा और रोज विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाएगी। इससे पहले प्रत्येक मंगलवार मां वाग्देवी का प्रतीकात्मक स्वरूप भोजशाला परिसर के भीतर ले जाया जाता था और सूर्यास्त के समय उसे वापस हटा लिया जाता था।
यह पहली बार है जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने प्रतीकात्मक स्वरूप को स्थायी रूप से वहीं स्थापित रखने की अनुमति दी है। इसे हाई कोर्ट के फैसले के बाद व्यवस्थाओं में आए बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। इसके साथ ही मैहर के शारदा मंदिर से लाई गई अखंड ज्योति भी अब लगातार प्रज्वलित रहेगी।
आंदोलन से जुड़े लोगों के अनुसार मां वाग्देवी की आत्मा के प्रतीक स्वरूप यह अखंड ज्योति 14 फरवरी 2004 को मैहर से धार लाई गई थी। अब तक इसे अखंड ज्योति मंदिर में सुरक्षित रखा गया था।
भोज उत्सव समिति के पदाधिकारियों ने कहा कि वसंत पंचमी तक ब्रिटेन से मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा को भारत लाने के प्रयास तेज किए जाएंगे। इसे भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा के पुनर्स्थापन का अभियान बताया गया।
आयोजन की शुरुआत गोमूत्र से परिसर के शुद्धीकरण से हुई। फिर गोबर से लेपन कर मंडल विधान सजाया व वैदिक पंडितों के मंत्रोच्चार के बीच हवन-पूजन हुआ। सुबह छह बजे शुरू हुआ आयोजन दोपहर 11:30 बजे तक चला। फिर महाआरती हुई। केंद्रीय राज्यमंत्री सावित्री ठाकुर ने भी पूजा-अर्चना की।