Bhojshala dispute case: लाठीचार्ज, कर्फ्यू और आंदोलन... भोजशाला संघर्ष की अंदरूनी कहानी
Bhojshala dispute case: भोजशाला को लेकर चला आंदोलन केवल धार्मिक या कानूनी लड़ाई नहीं रहा, बल्कि यह मालवा के सबसे बड़े जनआंदोलनों में भी शामिल हो गया। ...और पढ़ें
Publish Date: Fri, 15 May 2026 03:20:04 PM (IST)Updated Date: Fri, 15 May 2026 03:31:31 PM (IST)
वर्ष 2003 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी कार्यक्रम के तहत यहां पहुंचने पर भोजशाला का निरीक्षण किया था। वे चुनावी सभा के पूर्व यहां पहुंचे थे तब वह गुजरात के मुख्यमंत्री थे। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई जी भी 1985 में भोजशाला में बसंत पंचमी के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में शामिल हुए थे।HighLights
- 1990 के दशक में आंदोलन हुआ तेज
- 1996 में बढ़ गया टकराव
- 1997 का फैसला बना बड़ा मोड़
नईदुनिया प्रतिनिधि, धार। भोजशाला को लेकर चला आंदोलन केवल धार्मिक या कानूनी लड़ाई नहीं रहा, बल्कि यह मालवा के सबसे बड़े जनआंदोलनों में भी शामिल हो गया। वर्षों तक चले इस संघर्ष में सत्याग्रह, लाठीचार्ज, गिरफ्तारी, कर्फ्यू और प्रशासनिक कार्रवाई जैसे कई घटनाक्रम सामने आए।
आंदोलन के दौरान 39 लोग गंभीर रूप से घायल हुए, जबकि दो लोगों की मौत ने पूरे क्षेत्र का माहौल तनावपूर्ण बना दिया था।
1990 के दशक में आंदोलन हुआ तेज
भोजशाला को मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर मानने वाले संगठनों ने 1990 के दशक में आंदोलन को तेज करना शुरू किया। वर्ष 1994 में धार में सरस्वती वंदना और हनुमान चालीसा का पाठ प्रारंभ हुआ। इसके बाद विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और हिंदू जागरण मंच जैसे संगठनों ने भोजशाला मुक्ति आंदोलन को व्यापक स्वरूप दिया।
1996 में बढ़ा टकराव
छह दिसंबर 1996 को बजरंग दल के आह्वान पर प्रदेश स्तरीय शौर्य दिवस कार्यक्रम आयोजित किया गया। प्रशासन ने इसे रोकने के लिए सख्त कदम उठाए। इसके बाद आंदोलन और प्रशासन के बीच टकराव की स्थिति बनने लगी।
1997 का फैसला बना बड़ा मोड़
वर्ष 1997 में तत्कालीन सरकार ने मुस्लिम पक्ष को प्रत्येक शुक्रवार नमाज की अनुमति दी, जबकि हिंदू पक्ष के प्रवेश और पूजा-अर्चना पर प्रतिबंध लगाए गए। हिंदू संगठनों ने इसे धार्मिक अधिकारों का हनन बताते हुए बड़े आंदोलन की शुरुआत की। इसके बाद गांव-गांव में धर्मरक्षा समितियां बनाई गईं और धार आंदोलन का केंद्र बन गया।
सवा लाख लोगों का जुटान
आंदोलन के सबसे बड़े चरण में जिलेभर से बड़ी संख्या में लोग धार पहुंचे। आंदोलनकारियों के अनुसार एक लाख से अधिक धर्मरक्षकों ने भोजशाला मुक्ति का संकल्प लिया। महिलाओं की बड़ी भागीदारी भी इस आंदोलन की खास पहचान बनी। मातृशक्ति संगम में हजारों महिलाएं शामिल हुईं।
कर्फ्यू, लाठीचार्ज और गिरफ्तारी
आंदोलन के दौरान प्रशासन ने जिले के कई हिस्सों में धारा 144 लागू कर दी। 10 थाना क्षेत्रों में अनिश्चितकालीन कर्फ्यू लगाया गया। प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए लाठीचार्ज और गिरफ्तारियां हुईं। आंदोलन से जुड़े लोगों का दावा था कि जेलों में बंद कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट और दुर्व्यवहार भी हुआ। इसी दौर में 39 आंदोलनकारी गंभीर रूप से घायल हुए और दो लोगों की मौत हुई।
2003 में बदली व्यवस्था
लगातार आंदोलन और जनदबाव के बाद 8 अप्रैल 2003 को सरकार ने नई व्यवस्था लागू की। इसके तहत हिंदू पक्ष को प्रतिदिन दर्शन और प्रत्येक मंगलवार पूजा के लिए प्रवेश की अनुमति दी गई। इस फैसले के बाद धार में विजय उत्सव मनाया गया और मंदिरों में महाआरती आयोजित हुई। इसके बाद भी भोजशाला को लेकर विवाद समाप्त नहीं हुआ। पूजा-अधिकार, नमाज व्यवस्था और मूल स्वरूप को लेकर संघर्ष अदालत तक पहुंचा।