
नईदुनिया प्रतिनिधि, धार। आदिवासी अंचलों में मजदूरों की ढुलाई अब सिर्फ परिवहन नहीं, बल्कि संगठित “धंधा” बन चुकी है। पिकअप और लोडिंग वाहनों के जरिए खेतों तक मजदूर पहुंचाने का एक पूरा अनौपचारिक नेटवर्क काम कर रहा है, जिसमें ड्राइवर, बिचौलिये और किसान की त्रिकोणीय व्यवस्था तय करती है कि मजदूर कब, कितने और किस दर पर जाएंगे।
इस व्यवस्था में सबसे कमजोर कड़ी मजदूर है जो अपनी मजदूरी भी खो रहा है और रोज जान जोखिम में डालकर सफर करने को मजबूर है। ग्रामीण इलाकों में सुबह होते ही पिकअप वाहनों की कतारें लग जाती हैं। इन वाहनों में मजदूरों को इस तरह भरा जाता है जैसे माल लादा जा रहा हो।
क्षमता 10-12 की, लेकिन सवारियां 40-50 तक। महिलाओं और बच्चों तक को इसी तरह ठूंसकर ले जाया जाता है। कम किराए में ज्यादा कमाई के लालच में सुरक्षा पूरी तरह दरकिनार कर दी जाती है।
इस सिस्टम में वाहन मालिक या ड्राइवर पहले से किसानों से “ठेका” ले लेते हैं। उन्हें तय संख्या में मजदूर उपलब्ध कराने का। कई मामलों में मजदूरी की दर भी किसान और ड्राइवर ही तय कर लेते हैं। इसके बाद बिचौलिए गांवों से मजदूरों को इकट्ठा करते हैं। मजदूरों से प्रति व्यक्ति किराया वसूला जाता है, वहीं किसान से प्रति मजदूर कमीशन लिया जाता है। यानी एक ही मजदूर से दो तरफ से कमाई आने-जाने का किराया और मजदूरी पर कमीशन।
स्थानीय स्तर पर मिली जानकारी के अनुसार, एक पिकअप वाहन में औसतन 40 मजदूर भरे जाते हैं। प्रति मजदूर 30 से 50 रुपये किराया लिया जाता है। इस तरह एक चक्कर में ही 1500 से 2000 रुपये तक की आमदनी हो जाती है। यदि दिन में 2-3 चक्कर लगाए जाएं, तो एक वाहन से रोज 4 से 6 हजार रुपये तक कमाई संभव है। इसमें किसान से मिलने वाला कमीशन अलग। खर्च के नाम पर सिर्फ डीजल और मामूली रखरखाव यानी मुनाफा सीधा और तेज।
इस पूरी व्यवस्था में मजदूर सबसे ज्यादा नुकसान में है। एक तो उसे कम मजदूरी मिलती है, क्योंकि दर पहले से तय होती है। दूसरा, उसे खुद अपनी जेब से किराया देना पड़ता है। तीसरा और सबसे गंभीर उसकी जान हर रोज खतरे में रहती है। अक्सर हादसों में यही मजदूर घायल या मृत होते हैं, लेकिन जिम्मेदारी तय नहीं हो पाती।
मोटर व्हीकल एक्ट के तहत लोडिंग वाहनों में सवारी ढोना प्रतिबंधित है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे उलट है। खुलेआम ओवरलोडिंग हो रही है, बिना किसी रोक-टोक के। लोगों का कहना है कि ये सब प्रशासन और पुलिस की नजरों के सामने हो रहा है। सवाल उठता है कि क्या ये सिर्फ लापरवाही है या फिर कहीं न कहीं मिलीभगत भी?
विशेषज्ञों के अनुसार, ओवरलोडिंग और असुरक्षित ढुलाई सीधे तौर पर बड़े हादसों को न्योता देती है। खराब सड़कों और तेज रफ्तार के बीच ये जोखिम और बढ़ जाता है। पिछले कुछ समय में हुए कई हादसे इसी कड़ी का हिस्सा रहे हैं, लेकिन कोई ठोस नीति या सख्त कार्रवाई अब तक नजर नहीं आई।
विशेषज्ञों का मानना है कि मजदूरों के लिए सुरक्षित और नियमित परिवहन व्यवस्था विकसित करना जरूरी है। साथ ही, ठेका पद्धति के इस अनौपचारिक नेटवर्क को नियमन में लाना होगा। जब तक प्रशासन सख्ती नहीं दिखाएगा और वैकल्पिक व्यवस्था नहीं बनेगी, तब तक मजदूरों की जिंदगी यूं ही सस्ते सौदे में दांव पर लगती रहेगी।
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हम रोज ऐसे ही जाते हैं। गाड़ी में जगह नहीं होती, लेकिन जाना मजबूरी है। अगर नहीं जाएंगे तो काम नहीं मिलेगा। - आकाश, मजदूर
ड्राइवर पहले ही किसान से बात कर लेता है। हमें कितना मिलेगा, यह भी वही तय करता है। किराया भी देना पड़ता है।- युवा राहुल, मजदूर
कार्रवाई होती है, लेकिन कुछ दिन बाद सब फिर वैसे ही चलने लगता है। - अनिल ग्रेवाल