चुनावी हार के बाद दतिया में नरोत्तम युग के अंत के संकेत, भाजपा में नेतृत्व बदलने की तैयारी, जिलाध्यक्ष पद पर मंथन तेज, दौड़ में दो बड़े चेहरे
Datia BJP News: उपचुनाव के बाद डॉ. नरोत्तम मिश्रा समर्थकों पर शुरू हुई संगठनात्मक कार्रवाई ने भी पार्टी के भीतर हलचल बढ़ा दी है। सूत्र बताते हैं कि कई...और पढ़ें
Publish Date: Fri, 07 Aug 2026 11:54:56 AM (IST)Updated Date: Fri, 07 Aug 2026 12:55:36 PM (IST)
आशुतोष तिवारी और घनश्याम पिरौनिया। सोशल मीडियाHighLights
- संगठन को मजबूत करने आशुतोष तिवारी को मिल सकती है बड़ी कमान
- जातीय समीकरण साधने पूर्व विधायक घनश्याम पिरौनिया भी मजबूत दावेदार
- कार्रवाई से समर्थकों को बचाने भोपाल और दिल्ली के चक्कर लगा रहे मिश्रा गुट के नेता
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। दतिया विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव में पराजय के बाद भाजपा के सामने दतिया में नरोत्तम मुक्त जिला दतिया में नए सिरे से संगठन की संरचना और जिलाध्यक्ष का चयन बड़ी चुनौती माना जा रहा है। दतिया जिलाध्यक्ष की कमान सौंपने के लिए भाजपा प्रभावशाली चेहरे की तलाश कर रही है। जो कि संगठन को मजबूत करने के साथ पूर्व गृहमंत्री के प्रभाव के सामने मजबूती के साथ खड़ा रह सके।
आशुतोष-घनश्याम पर हो रहा है विचार
प्रदेश नेतृत्व आशुतोष तिवारी की दतिया जिले में सक्रियता बनाए रखने के लिए प्रभावी भूमिका में लाने पर विचार हो रहा है। तिवारी अंचल में संभागीय संगठन दायित्व संभाल चुके हैं। उन्हें संगठन को नए सिरे से खड़ा करना और संगठन के प्रति निष्ठावान कार्यकर्ताओं को गढ़ने का अनुभव भी है। जिलाध्यक्ष के लिए आशुतोष तिवारी के बाद दूसरा नाम घनश्याम पिरौनिया का है।
जो कि अनुसूचित वर्ग के लिए आरक्षित भांडेर से विधायक रह चुके हैं और क्षेत्र अनुसूचित वर्ग चुनाव की दृष्टि से निर्णायक भूमिका है। अकेले दतिया विधानसभा क्षेत्र में 23.8 प्रतिशत हैं। दूसरी तरफ मिश्रा समर्थकों पर शुरू हुई कार्रवाई को रोकने के लिए भोपाल व दिल्ली में नेताओं के दरवाजे में दस्तक दे रहे हैं। ताकि आगे होने वाली कार्रवाईयों से समर्थकों को बचा सके।
अनुसूचित वर्ग को साधने के लिए घनश्याम की होगी प्रभावी भूमिका
संगठन को नए सिरे से खड़ा करने के लिए वरिष्ठ भाजपा नेता आशुतोष तिवारी का नाम सबसे आगे चल रहा है। तिवारी पूर्व में संभागीय संगठन का दायित्व निभा चुके हैं और उन्हें बूथ स्तर तक संगठन विस्तार तथा कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने का अनुभव है। प्रदेश नेतृत्व उन्हें दतिया में प्रभावी भूमिका देकर संगठन को नई दिशा देने पर गंभीरता से विचार कर रहा है। माना जा रहा है कि उन्हें ऐसी जिम्मेदारी दी जा सकती है, जिससे वे जिले में संगठन को मजबूत करने और नए नेतृत्व को तैयार करने का काम कर सकें।
जिलाध्यक्ष पद के लिए दूसरा प्रमुख नाम पूर्व विधायक घनश्याम पिरौनिया का है। अनुसूचित वर्ग के लिए आरक्षित भांडेर विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके पिरौनिया संगठन और क्षेत्रीय राजनीति दोनों में सक्रिय रहे हैं। दतिया विधानसभा क्षेत्र में अनुसूचित वर्ग के मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 23.8 प्रतिशत है। बसपा के विकल्प के रूप में अनुसूचित वर्ग की राजनीति करने वाले राजनीतिक दल आजाद समाज पार्टी के उम्मीदवार दामोदर यादव को भी 23 हजार वोट हासिल करने में कामयाब हुए हैं। ऐसे में यदि भाजपा सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखकर निर्णय लेती है तो पिरौनिया मजबूत दावेदार साबित हो सकते हैं।
बुंदेलखंड की राजनीति का केंद्र हैं दतिया
उपचुनाव के बाद डॉ. नरोत्तम मिश्रा समर्थकों पर शुरू हुई संगठनात्मक कार्रवाई ने भी पार्टी के भीतर हलचल बढ़ा दी है। सूत्र बताते हैं कि कई नेता भोपाल और दिल्ली में वरिष्ठ नेतृत्व से लगातार संपर्क कर रहे हैं, ताकि समर्थकों के खिलाफ प्रस्तावित अनुशासनात्मक कार्रवाई को रोका जा सके। हालांकि प्रदेश नेतृत्व इस बार संगठनात्मक अनुशासन और जवाबदेही के मुद्दे पर सख्त रुख अपनाए हुए है। भाजपा के लिए दतिया केवल एक जिला नहीं, बल्कि बुंदेलखंड की राजनीति का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।
इसलिए उपचुनाव की हार के बाद यहां होने वाला संगठनात्मक पुनर्गठन भविष्य की चुनावी रणनीति की दृष्टि से भी अहम माना जा रहा है। पार्टी नेतृत्व चाहता है कि नई जिला टीम गुटीय राजनीति से ऊपर उठकर संगठन को मजबूत करे और कार्यकर्ताओं का विश्वास दोबारा हासिल करे। ऐसे में जिलाध्यक्ष की नियुक्ति और संगठन में होने वाले बदलाव आने वाले दिनों में मध्यप्रदेश भाजपा की राजनीति का महत्वपूर्ण घटनाक्रम साबित हो सकते हैं।