नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। दतिया विधानसभा उपचुनाव के नतीजों ने भाजपा की उस चुनावी रणनीति की जमीनी हकीकत सामने ला दी है, जिसमें सामाजिक और जातीय समीकरणों को साधने के लिए पार्टी ने अपने बड़े नेताओं और मंत्रियों को मैदान में उतारा था। चुनाव में सांसद भारत सिंह कुशवाह को संयोजक की जिम्मेदारी दी गई, जबकि विधानसभा क्षेत्र के छह मंडलों की कमान अलग-अलग सामाजिक आधार वाले छह मंत्रियों को सौंपी गई। इसके बावजूद भाजपा छह में से केवल दो मंडलों में बढ़त बना सकी, जबकि चार मंडलों में कांग्रेस आगे रही।
नगर मंडल में लगा बड़ा झटका
सबसे बड़ा झटका नगर मंडल में लगा, जहां भाजपा को पांच हजार 604 मतों से पिछड़ना पड़ा। भाजपा ने चुनाव को केवल प्रत्याशी के स्तर पर नहीं छोड़ा, बल्कि सामाजिक समीकरणों के हिसाब से संगठन के प्रभावशाली चेहरों को जिम्मेदारियां दीं। छह मंडलों में राव उदयप्रताप सिंह, तुलसी सिलावट, नरेंद्र शिवाजी पटेल, धर्मेंद्र लोधी, दिलीप जायसवाल और ऐंदल सिंह कंसाना को जिम्मेदारी दी गई।
इसके अलावा जगदीश देवड़ा, राहुल कोठारी, शैलेन्द्र बरुआ, भारत सिंह कुशवाह, अरविंद भदौरिया सहित कई प्रमुख नेताओं को अलग-अलग स्तर पर चुनावी जिम्मेदारियां सौंपी गईं। पार्टी के पास मंत्रियों, सांसदों और वर्तमान व पूर्व सांसद-विधायकों का बड़ा नेटवर्क भी था। इसके बावजूद परिणाम यह संकेत देते हैं कि बड़े नेताओं की मौजूदगी को सीधे वोट में बदलना आसान नहीं रहा। खासकर तब, जब स्थानीय स्तर पर संगठन की पकड़, बूथ कमेटियों की सक्रियता, प्रत्याशी की स्वीकार्यता और मतदाताओं के बीच स्थानीय मुद्दों की धार अधिक प्रभावी हो।
नगर मंडल का परिणाम सबसे बड़ा संकेत
भाजपा के लिए नगर मंडल का परिणाम विशेष रूप से राजनीतिक मंथन का विषय बन सकता है। यहां पांच हजार 604 मतों की हार केवल एक मंडल की हार नहीं, बल्कि शहरी क्षेत्र में पार्टी की रणनीति और स्थानीय संगठन की सक्रियता पर सवाल खड़े करती है। भाजपा के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि शहरी मतदाता परंपरागत रूप से संगठन, सरकार और नेतृत्व के प्रदर्शन को अलग-अलग कसौटियों पर परखता है।
छह मंडलों में चार में कांग्रेस की बढ़त यह संकेत देती है कि कांग्रेस ने स्थानीय स्तर पर भाजपा के सामाजिक समीकरणों में सेंध लगाने में सफलता हासिल की। इसका अर्थ यह नहीं कि भाजपा का जातीय आधार समाप्त हो गया, बल्कि यह कि वह आधार चुनाव के दिन एकजुट होकर भाजपा के पक्ष में परिवर्तित नहीं हो सका।
अब संगठनात्मक समीक्षा का है अवसर
दतिया उपचुनाव का परिणाम भाजपा के लिए केवल हार-जीत का आंकड़ा नहीं, बल्कि संगठनात्मक समीक्षा का अवसर भी है। बड़े नेताओं को जिम्मेदारी देने के बाद भी यदि मंडल स्तर पर अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते हैं तो पार्टी को यह देखना होगा कि समस्या सामाजिक समीकरण में थी या स्थानीय नेतृत्व में, प्रत्याशी की स्वीकार्यता में या बूथ प्रबंधन में। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भाजपा के सामाजिक क्षत्रप वास्तव में अपने-अपने प्रभाव वाले वर्ग को मतदान केंद्र तक और वहां से पार्टी के पक्ष में वोट तक ले जाने में नाकाम रहे। दतिया का परिणाम इस दावे की जमीनी परीक्षा बन गया है।
आने वाले समय में भाजपा के संगठनात्मक फैसलों पर भी इस चुनाव का असर दिखाई दे सकता है। खासकर मंडल और बूथ स्तर पर सक्रियता, स्थानीय नेतृत्व की भूमिका और सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर पार्टी नए सिरे से रणनीति बना सकती है। दतिया ने साफ कर दिया है कि चुनावी राजनीति में बड़े नाम और जातीय गणित महत्वपूर्ण जरूर हैं, लेकिन अंतिम फैसला मतदाता के बूथ तक पहुंचने और स्थानीय मुद्दों पर उसके निर्णय से ही होता है।
पिछड़े वर्ग का सबसे बड़ा आधार, फिर भी नहीं बन सका निर्णायक समीकरण
- दतिया विधानसभा के सामाजिक आंकड़ों में अन्य पिछड़ा वर्ग सबसे बड़ा समूह है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार ओबीसी मतदाताओं की अनुमानित संख्या करीब 1.09 लाख यानी 50.7 प्रतिशत है।
- अनुसूचित जाति के करीब 51 हजार 270 मतदाता यानी 23.8 प्रतिशत और सामान्य वर्ग के लगभग 37 हजार 840 मतदाता यानी 17.6 प्रतिशत हैं।
- मुस्लिम मतदाताओं की संख्या नौ हजार 461 और अनुसूचित जनजाति के मतदाता करीब छह हजार 320 बताए गए हैं, लेकिन नतीजों ने यह भी दिखाया कि जातीय प्रतिनिधित्व और सामाजिक नेतृत्व अपने आप में पर्याप्त नहीं हैं।
- यदि किसी सामाजिक वर्ग के प्रभावशाली नेता को जिम्मेदारी दी गई है, तो उसकी वास्तविक परीक्षा उस वर्ग के वोटों को पार्टी के पक्ष में लामबंद कराने से होती है।