किसान ध्यान दें: फसल बीमा कराने की अंतिम तिथि बढ़कर हुई 17 अगस्त; अब तक ग्वालियर जिले के 42,700 किसान करा चुके हैं इंश्योरेंस
PM Fasal Bima Yojana Last Date: हालांकि अंचल के किसान इस योजना में अपेक्षित रुचि नहीं दिखा रहे हैं। सबसे चिंताजनक संख्या अऋणी किसानों की है, जिन्होंने...और पढ़ें
Publish Date: Sun, 02 Aug 2026 03:34:17 PM (IST)Updated Date: Sun, 02 Aug 2026 03:35:19 PM (IST)
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- फसल बीमा में किसानों की रुचि नहीं, पिछले साल के बराबर किसानों ने कराया रिन्युअल
- बीमा कंपनियों की नुकसान आकलन की नीति और कम क्लेम राशि है बड़ी वजह
- जिन किसानों ने बैंक से कर्ज लिया उन्हीं ने कराया रिन्युअल
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। जिले में खरीफ की फसलों का बीमा तकरीबन पिछले साल के बराबर ही किसानों ने कराया है। पिछले साल 42 हजार किसानों ने फसलों का बीमा कराया था और इस बार 42 हजार 700 किसानों ने बीमा कराया है। बीमा कराने की आखिरी तारीख 31 जुलाई थी, लेकिन अब इसे बढ़ाकर 17 अगस्त कर दिया गया है। जिससे अधिक से अधिक किसान फसल का बीमा करा सकें।
नहीं दिखा रहे हैं अपेक्षित रुचि किसान
हालांकि अंचल के किसान इस योजना में अपेक्षित रुचि नहीं दिखा रहे हैं। सबसे चिंताजनक संख्या अऋणी किसानों की है, जिन्होंने बैंक से लोन नहीं लिया है। ऐसे में महज 90 अऋणी किसानों ने ही अब तक अपनी इच्छा से बीमा कराया है। अऋणी किसानों का बीमा न कराने से समझ में आता है कि अंचल में बीमा कराने में किसानों की रुचि नहीं है।
केवल ऋणी किसान ही करा रहे हैं बीमा
अंचल में जिन 42 हजार 610 किसानों ने बीमा कराया है, उन्होंने खेती के लिए सोसायटी या बैंकों से खाद-बीज या अन्य खेती के काम के लिए लोन लिया है। इसके पीछे बताया जाता है कि इन किसानों पर प्रशासन व विभाग का दबाव रहता है, या दूसरे शब्दों में कहें कि खेती के लिए ऋण लेने की शर्त ही फसल का बीमा कराना रहता है।
जबकि इसके उलट जिन किसानों ने खेती के लिए सोसायटी या बैंक से लोन नहीं लिया है, उनकी फसल बीमा कराने में किसी तरह की रुचि नहीं है। यही वजह है कि अभी तक केवल 90 किसानों ने ही अपनी खरीफ की फसलों का बीमा कराया है।
क्यों नहीं कराते किसान बीमा
- योजना में विसंगतियां: किसान फसल बीमा न कराने के पीछे प्रशासनिक व तकनीकी विसंगतियां हैं, जिनके कारण प्रीमियम की राशि जमा करने के बावजूद आपदा के समय उन्हें क्लेम का उचित लाभ नहीं मिल पाता। कभी-कभी तो 10 रुपये या 20 रुपये ही बीमा मिल पाता है।
- पटवारी हल्का इकाई प्रणाली: योजना में व्यक्तिगत खेत के बजाय पूरे पटवारी हल्के (ग्राम पंचायत) को एक बीमा इकाई माना जाता है। यदि किसी एक गांव के खेतों में प्राकृतिक आपदा से भारी नुकसान होता है, लेकिन बाकी हल्के में उत्पादन ठीक रहता है, तो प्रभावित किसान क्लेम से वंचित रह जाते हैं।
- 72 घंटे की कड़ी शर्त: बाढ़, जलभराव या ओलावृष्टि जैसी स्थानीय आपदाओं में 72 घंटे के भीतर आनलाइन या ऐप पर सूचना देने की जटिल शर्त है। ग्रामीण अंचलों में सर्वर डाउन रहने, नेटवर्क समस्या और डिजिटल साक्षरता के अभाव में किसान समय पर शिकायत दर्ज नहीं करा पाते।
- क्रॉप कटिंग व बीमा कंपनियों की मनमानी: फसल कटाई प्रयोगों में पारदर्शिता की कमी, बैंकों द्वारा फार्म भरते समय की जाने वाली गलत प्रविष्टियां और क्लेम भुगतान में महीनों की देरी से किसान परेशान हैं।
यह भी है वजह
अधिकतर बड़े किसान अपनी खेती को दूसरे किसानों से कराते है। जिसे अंचल की भाषा इसे आध-बटाई या ठेके पर खेत देना भी कहते हैं। इस पद्धति से खेती करने वाले किसानों के नाम से जमीन नहीं होती। ऐसे में वह यदि बीमा कराता है तो नुकसान का क्लेम आध बटाई या ठेके पर जमीन को देने वाले किसान को मिलता है। ऐसे में ये किसान फसल का बीमा नहीं कराते।
31 जुलाई तक जिले भर में 42 हजार 700 किसानों ने अपनी फसल का बीमा कराया है। इसमें 90 किसान ऐसे हैं जिन्होंने लोन नहीं लिया है। लेकिन कंपनी ने फसल बीमा कराने की अंतिम तिथि 31 जुलाई से बढ़ाकर 17 अगस्त कर दिया है। जिससे अधिक से अधिक किसान फसल बीमा योजना का लाभ उठा सकें। - अखिलेख गौतम, डिस्ट्रिक्ट मैनेजर, फसल बीमा कंपनी