लापता बच्चियों के मामले में ग्वालियर हाईकोर्ट सख्त: SSP तलब, पूछा-कैसे नष्ट हुआ गुमशुदा लोगों का डेटा?
कोर्ट ने कहा कि अगली तारीख पर पुलिस अधिकारियों को स्पष्ट करना होगा कि गुमशुदा व्यक्तियों का डाटा आखिर नष्ट कैसे हो गया। यदि डाटा नष्ट नहीं हुआ है, तो ...और पढ़ें
Publish Date: Sat, 25 Jul 2026 10:12:38 AM (IST)Updated Date: Sat, 25 Jul 2026 10:13:05 AM (IST)
एआई से बना चित्र।HighLights
- पुलिस एफिडेविट में विरोधाभास पर कोर्ट ने जताई नाराजगी
- 5 वर्षों में 800 नाबालिग बच्चियों के लापता होने का दावा
- लापता महिलाओं और बच्चियों की तलाश के लिए बने ठोस व्यवस्था
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने बच्चियों और महिलाओं के लगातार लापता होने के मामलों में सुनवाई करते हुए पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने ग्वालियर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) धर्मवीर सिंह को व्यक्तिगत रूप से तलब करते हुए निर्देश दिए हैं कि अगली सुनवाई पर वे स्वयं उपस्थित होकर कोर्ट के सभी सवालों के संतोषजनक जवाब दें। सुनवाई के दौरान अदालत ने विशेष रूप से गुमशुदा लोगों के रिकार्ड को लेकर सवाल उठाए।
नष्ट नहीं हुआ है तो कोर्ट में पेश क्यों नहीं कराया
कोर्ट ने कहा कि अगली तारीख पर पुलिस अधिकारियों को स्पष्ट करना होगा कि गुमशुदा व्यक्तियों का डाटा आखिर नष्ट कैसे हो गया। यदि डाटा नष्ट नहीं हुआ है, तो उसे अदालत के समक्ष उपलब्ध क्यों नहीं कराया जा रहा। हाई कोर्ट ने इस संबंध में विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा है।
दरअसल पिछली सुनवाई में पुलिस अधिकारियों ने एक शपथपत्र (एफिडेविट) प्रस्तुत किया था, लेकिन उसमें मिले विरोधाभास पर अदालत ने गंभीर आपत्ति जताई और अधिकारियों से जवाब तलब किया। संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर कोर्ट ने एसएसपी को स्वयं उपस्थित होने के निर्देश दिए।
मामला जनहित याचिका पर है विचारधीन
दरअसल यह मामला अधिवक्ता आशीष प्रताप सिंह द्वारा दायर जनहित याचिका पर विचाराधीन है। याचिका में बताया गया है कि पिछले पांच वर्षों में ग्वालियर क्षेत्र से करीब 800 नाबालिग बच्चियों के लापता होने के मामले दर्ज हुए हैं। याचिकाकर्ता का आरोप है कि इन मामलों में पुलिस की कार्रवाई प्रभावी नहीं रही और बड़ी संख्या में बच्चियों का लंबे समय तक कोई पता नहीं चल सका।
याचिका में अदालत से मांग की गई है कि लापता बच्चियों और महिलाओं की तलाश के लिए प्रभावी, समयबद्ध और जवाबदेह व्यवस्था बनाई जाए। साथ ही ऐसे मामलों की जांच की नियमित न्यायिक निगरानी भी सुनिश्चित की जाए, ताकि हर मामले में गंभीरता से कार्रवाई हो और पीड़ित परिवारों को न्याय मिल सके। हाई कोर्ट लगातार इस मामले की मॉनिटरिंग कर रहा है और पुलिस से विस्तृत रिपोर्ट मांग रहा है।