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'जो व्यक्ति दशकों तक अपने अधिकारों पर सोया रहे, वह राहत का दावा नहीं कर सकता...', ग्वालियर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि जो व्यक्ति वर्षों तक अपने अधिकारों के प्रति उदासीन बना रहता है, वह बाद में संविधान के अनुच...और पढ़ें

By Vikram Singh TomarEdited By: Mohan Kumar
Publish Date: Fri, 31 Jul 2026 12:47:05 PM (IST)Updated Date: Fri, 31 Jul 2026 12:47:05 PM (IST)
'जो व्यक्ति दशकों तक अपने अधिकारों पर सोया रहे, वह राहत का दावा नहीं कर सकता...', ग्वालियर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
ग्वालियर हाईकोर्ट ने खारिज की 23 साल बाद अपील करने वाले की याचिका (फाइल फोटो)

HighLights

  1. हाईकोर्ट ने खारिज की 23 साल बाद अपील करने वाले की याचिका
  2. कोर्ट ने कहा कि सालों तक अधिकारों पर सोने वालों को नहीं मिलेगी राहत
  3. कोर्ट बोला कि अनुच्छेद-226 का उपयोग केवल सतर्क नागरिकों के लिए

नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि जो व्यक्ति वर्षों तक अपने अधिकारों के प्रति उदासीन बना रहता है, वह बाद में संविधान के अनुच्छेद-226 के तहत राहत पाने का अधिकार नहीं जता सकता। कोर्ट ने कहा कि दशकों पुराने विवादों को दोबारा खोलने की अनुमति देना न्यायिक निर्णयों की अंतिमता और दूसरे पक्ष के स्थापित अधिकारों को प्रभावित करेगा। यह टिप्पणी करते हुए न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फड़के की एकलपीठ ने भोलाराम किरार की याचिका खारिज कर दी।

याचिकाकर्ता ने अतिरिक्त आयुक्त, ग्वालियर संभाग द्वारा 22 अगस्त 2022 को पारित आदेश को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता का दावा था कि वह वर्ष 1970 से पहले से विवादित भूमि पर खेती कर रहा है। उसके पिता ने भूमि को खेती योग्य बनाया था और वर्ष 1994 में सक्षम राजस्व अधिकारी ने जांच के बाद उसके पक्ष में भूमि का पट्टा (सेटलमेंट) कर दिया था। बाद में वर्ष 1999 में अतिरिक्त कलेक्टर ने स्वप्रेरणा से पुनरीक्षण करते हुए उस आदेश को निरस्त कर दिया। इसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने करीब 23 वर्ष बाद अतिरिक्त आयुक्त के समक्ष अपील दायर की, जिसे वर्ष 2022 में अत्यधिक देरी के कारण खारिज कर दिया गया।


इसके बाद भी याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा तुरंत नहीं खटखटाया और लगभग तीन साल बाद वर्ष 2025 में रिट याचिका दायर की। सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से कहा गया कि याचिका अत्यधिक विलंब और लापरवाही से ग्रसित है। याचिकाकर्ता यह बताने में असफल रहा कि वह इतने लंबे समय तक निष्क्रिय क्यों रहा। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि अनुच्छेद-226 के तहत हाईकोर्ट का अधिकार क्षेत्र विवेकाधीन और न्यायसंगत है। ऐसे में राहत मांगने वाले व्यक्ति को उचित समय पर और पूरी सतर्कता के साथ न्यायालय आना चाहिए।

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अदालत ने कहा कि जो व्यक्ति दशकों तक अपने अधिकारों पर सोया रहता है, वह बाद में असाधारण संवैधानिक अधिकार क्षेत्र का लाभ नहीं ले सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने केवल वर्ष 2022 के आदेश को चुनौती देकर वर्ष 1999 के आदेश को अप्रत्यक्ष रूप से चुनौती देने का प्रयास किया है, जबकि वास्तविक विवाद उसी आदेश से जुड़ा है। सीमाबद्धता और देरी के सिद्धांत को इस प्रकार दरकिनार नहीं किया जा सकता।इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने माना कि अतिरिक्त आयुक्त द्वारा अपील खारिज करने में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है।