Scindia Property Dispute: 78 साल पुराने दस्तावेज से तय होगा सिंधिया राजघराने की संपत्तियों का मालिक कौन, 28 जुलाई अहम
सिंधिया राजघराने के संपत्ति विवाद में 1948 का ऐतिहासिक कोवेनेंट दस्तावेज अहम बन गया है। 28 जुलाई की सुनवाई में इसी आधार पर निजी और सरकारी संपत्तियों क...और पढ़ें
Publish Date: Fri, 24 Jul 2026 07:30:11 PM (IST)Updated Date: Fri, 24 Jul 2026 07:30:11 PM (IST)
28 जुलाई को सिंधिया राजघराने की संपत्तियों के मामले की सुनवाई। (फाइल फोटो)HighLights
- 1948 का कोवेनेंट दस्तावेज संपत्ति विवाद में अहम आधार बना।
- 28 जुलाई को ग्वालियर जिला न्यायालय में अगली सुनवाई होगी।
- ज्योतिरादित्य सिंधिया समेत कई उत्तराधिकारी संपत्तियों पर दावा कर रहे।
वरुण शर्मा, नईदुनिया : ग्वालियर। सिंधिया राजघराने के बहुचर्चित संपत्ति विवाद में अब 78 वर्ष पुराना 'द कोवेनेंट' (अनुबंध) सबसे महत्वपूर्ण कानूनी दस्तावेज बनकर सामने आया है।
वर्ष 1948 में ग्वालियर, इंदौर और मालवा की रियासतों को मिलाकर संयुक्त राज्य मध्य भारत के गठन के दौरान तैयार किए गए इस अनुबंध के आधार पर अदालत यह तय करेगी कि कौन-सी संपत्तियां सिंधिया राजपरिवार की निजी थीं और कौन-सी तत्कालीन मध्य भारत सरकार को हस्तांतरित की गई थीं। ग्वालियर जिला न्यायालय में लंबित मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई को प्रस्तावित है, जिसमें इस दस्तावेज की भूमिका निर्णायक मानी जा रही है।
उत्तराधिकारियों के बीच वर्षों से चल रहा है विवाद
सिंधिया राजघराने की कई संपत्तियों के स्वामित्व को लेकर परिवार के उत्तराधिकारियों के बीच लंबे समय से विवाद जारी है। इन संपत्तियों पर केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, उनकी बुआ एवं राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, मध्य प्रदेश की पूर्व मंत्री यशोधरा राजे सहित परिवार के अन्य सदस्यों ने दावा किया है। अदालत अब कोवेनेंट के प्रावधानों के आधार पर यह तय करेगी कि मध्य भारत राज्य के गठन के समय कौन-सी संपत्तियां निजी स्वामित्व में बनी रहीं।
1948 में हुआ था मध्य भारत का गठन
- वर्ष 1948 में ग्वालियर, इंदौर और मालवा की रियासतों को मिलाकर संयुक्त राज्य मध्य भारत बनाया गया था। इसी उद्देश्य से तैयार किए गए कोवेनेंट पर तत्कालीन ग्वालियर महाराजा जीवाजीराव सिंधिया, इंदौर के महाराजा यशवंतराव होलकर, धार के महाराजा आनंदराव पवार, अलीराजपुर के महाराजा सुरेंद्र सिंह, बड़वानी के राणा देवी सिंह तथा भारत सरकार के रियासत मंत्रालय के सचिव वी.पी. मेनन ने हस्ताक्षर किए थे।
- इस दस्तावेज में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि कौन-सी संपत्तियां शासकों की निजी रहेंगी और किन संपत्तियों का स्वामित्व नई सरकार को सौंपा जाएगा।
ऊटी से काशी और गोवा तक दर्ज हैं निजी संपत्तियां
कोवेनेंट में जीवाजीराव सिंधिया की निजी संपत्तियों का विस्तृत उल्लेख किया गया है। इनमें ग्वालियर, काशी का गंगा महल, ऊटी के लॉज और बंगले, गोवा की संपत्तियां, तथा मुंबई के दादर, धोबी तालाब, गवालिया टैंक रोड और वर्ली स्थित समुद्र महल जैसी संपत्तियां शामिल हैं। वर्तमान विवाद में इन्हीं संपत्तियों को लेकर दावेदारी की जा रही है।
धार्मिक स्थलों का भी किया गया उल्लेख
दस्तावेज में सिंधिया राजवंश से जुड़े धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थलों का भी उल्लेख है। इनमें छतरी बाजार की शाही छतरियां, विठ्ठल मंदिर, कोटेश्वर, भूतेश्वर मंदिर, उज्जैन के द्वारकाधीश और मदनमोहन मंदिर, तथा काशी स्थित गंगा महल के प्रबंधन का अधिकार राजपरिवार के पास रहने की बात दर्ज है।
सरकार को सौंपी गई थीं सार्वजनिक संपत्तियां
- कोवेनेंट के तहत कई महत्वपूर्ण सार्वजनिक उपयोग की संपत्तियां तत्कालीन मध्य भारत सरकार को हस्तांतरित की गई थीं। इनमें मोती महल पैलेस, गोरखी पैलेस, सरस्वती महल, जल विहार, गेंदघर, तिघरा कोठी, ग्वालियर किले की गद्दी बैरक, भदैया कुंड और शिवपुरी का फूलबाग शामिल हैं।
- अब अदालत इसी ऐतिहासिक दस्तावेज के आधार पर संपत्तियों के स्वामित्व और उत्तराधिकार संबंधी विवाद पर आगे की सुनवाई करेगी।
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