
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर : इंटरनेट मीडिया का बढ़ता इस्तेमाल अब केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रह गया है। इसके एल्गोरिदम किशोरों और युवाओं की पसंद के अनुसार लगातार एक जैसे कंटेंट परोस रहे हैं। इसका असर उनके व्यवहार, सोच और मानसिक स्वास्थ्य पर दिखाई देने लगा है।
एक ही तरह के नकारात्मक, हिंसक, अवास्तविक जीवनशैली या मानसिक तनाव से जुड़े कंटेंट को बार-बार देखने से किशोर और युवा धीरे-धीरे उसके प्रभाव में आ रहे हैं। यही वजह है कि मनोचिकित्सकों के पास इंटरनेट मीडिया के अत्यधिक उपयोग के कारण होने वाली समस्याओं से जुड़े किशोरों और युवाओं की संख्या बढ़ रही है।
मनोचिकित्सकों के पास ऐसे किशोर और युवा पहुंच रहे हैं, जो लंबे समय तक इंटरनेट मीडिया देखने के बाद बेचैनी, उदासी, चिड़चिड़ापन, अकेलापन और ध्यान लगाने में परेशानी जैसी शिकायतें कर रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इंटरनेट मीडिया का एल्गोरिदम यूजर की पसंद को समझकर उसी तरह का कंटेंट बार-बार सामने लाता है।
शुरुआत में यह सुविधा अच्छी लगती है, लेकिन जब कोई व्यक्ति लगातार एक ही तरह के कंटेंट में लगा रहता है तो उसके सामने दूसरी तरह की जानकारी और विचार कम आने लगते हैं। इससे उसकी सोच एक ही दिशा में जाने लग सकती है। ऐसे में वह खुद की तुलना उससे करने लगता है। उसे लग सकता है कि बाकी लोगों का जीवन उससे बेहतर है।
बड़ों के साथ यह समस्या बच्चों में भी तेजी से बढ़ रही है। मनोचिकित्सक डा. नीधि जैन बुखारिया के अनुसार, ऐसे बच्चों के मामले भी सामने आ रहे हैं, तो अश्लील कंटेंट देखने के कारण ओसीडी के शिकार हो रहे हैं। इसके अलावा एग्रेसिव कंटेंट देखने के कारण उनमें एग्रेशन की समस्या भी बढ़ रही है।
कई बार तो वे अपने माता-पिता के साथ मारपीट करने लगते हैं। इनसेल एंजाइटी बीमारियों से जुड़े कंटेट भी बच्चे ज्यादा देखने लगे हैं, इस कारण बच्चों में डर बढ़ने लगता है। इसके अलावा बच्चों में एडीएसडी सिंप्टम भी देखले को मिलता है। उन्होंने बताया कि ऐसे बच्चों की काउंसलिंग की जाती है। इस तरह उन्हें ठीक करने में एक से दो माह तक का समय लग जाता है।
मनोविज्ञानी मनोज शुक्ला के अनुसार, इंटरनेट मीडिया पर हर तरह का कंटेंट मौजूद है। इसमें डर, हिंसा, असफलता, झगड़े, ब्रेकअप, आत्महत्या, शरीर को लेकर चिंता, नशे और दूसरी परेशानियों से जुड़ा कंटेंट भी शामिल है। यदि ऐसा कंटेंट लगातार दिखता रहे तो उसके मन पर उसका असर पड़ सकता है।
वे बताते हैं कि खासकर जो लोग जो पहले से किसी परेशानी, अकेलेपन या तनाव से गुजर रहे हैं, उनमें लगातार नकारात्मक कंटेंट देखने से बेचैनी और डर बढ़ रहा है। इसके साथ ही इसका असर नींद पर भी देखा जा रहा है। कई लोग रात में मोबाइल चलाते रहते हैं। वीडियो देखते-देखते समय का पता नहीं चलता और सोने का समय लगातार आगे बढ़ता जाता है। नींद पूरी नहीं होने पर अगले दिन पढ़ाई या काम में मन लगाना मुश्किल हो सकता है। चिड़चिड़ापन और थकान भी बढ़ सकती है।
मनोचिकित्सक डॉ. स्वाति बोथरा के अनुसार, बच्चों से इंटरनेट मीडिया के इस्तेमाल को लेकर खुलकर बात करना जरूरी है। माता-पिता अगर हर बार मोबाइल देखने पर डांटेंगे या फोन छीन लेंगे तो बच्चा अपनी परेशानी बताने से बच सकता है। इसके बजाय यह जानने की कोशिश करनी चाहिए कि वह क्या देख रहा है और उसे वह कंटेंट क्यों पसंद आ रहा है।
इसके साथ ही केवल इंटरनेट मीडिया पर कितना समय दिया जा रहा है, यह देखना काफी नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि बच्चा क्या देख रहा है। अगर किसी खास तरह का कंटेंट देखने के बाद उसका व्यवहार बदल रहा है, वह ज्यादा परेशान या चिड़चिड़ा हो रहा है, तो उस पर ध्यान देना चाहिए।
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