
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर: भागीरथपुरा दूषित पानी कांड (Indore Contaminated Water Case) की न्यायिक जांच कराई जाएगी। इस जांच की जिम्मेदारी हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज सुशील कुमार गुप्ता को सौंपी गई है। उन्हें चार सप्ताह के भीतर अपनी अंतरिम रिपोर्ट MP हाईकोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करनी होगी। यह आदेश भागीरथपुरा मामले से संबंधित पांच जनहित याचिकाओं की सुनवाई के बाद जारी किया गया।
MP हाईकोर्ट ने मंगलवार को लंबी सुनवाई के बाद आदेश सुरक्षित रख लिया था, जो देर शाम जारी हुआ। आठ पृष्ठों के आदेश में कोर्ट ने कहा कि मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के लिए न्यायिक आयोग का गठन आवश्यक है, ताकि सच्चाई सामने आ सके और जिम्मेदारी तय की जा सके।
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कोर्ट ने जिला प्रशासन, नगर निगम, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को निर्देश दिए हैं कि वे आयोग को पूर्ण सहयोग प्रदान करें। साथ ही आयोग को सभी आवश्यक रिकार्ड, दस्तावेज और जानकारियां उपलब्ध कराई जाएं। शासन आयोग को कार्यालय, स्टाफ और आवागमन की सुविधाएं भी उपलब्ध कराएगा।
न्यायिक आयोग भागीरथपुरा क्षेत्र में उपलब्ध कराए जा रहे पानी की गुणवत्ता, पानी के दूषित होने के कारण, सीवरेज, औद्योगिक अपशिष्ट या पाइपलाइन लीकेज की भूमिका, दूषित पानी से हुई मौतों की वास्तविक संख्या और मौतों के प्रकार की जांच करेगा। इसके अलावा दूषित पानी कांड के बाद मेडिकल सुविधाओं की उपलब्धता, स्वच्छ पानी उपलब्ध कराने के लिए उठाए गए कदम, प्रथमदृष्टया दोषी अधिकारियों की पहचान और प्रभावित लोगों के मुआवजे के लिए गाइडलाइन तैयार करने पर भी आयोग विचार करेगा।
मंगलवार को हाईकोर्ट में लगभग पौने दो घंटे तक सुनवाई चली। इस दौरान शासन द्वारा प्रस्तुत डेथ ऑडिट रिपोर्ट पर कोर्ट और याचिकाकर्ताओं ने कई गंभीर सवाल उठाए। रिपोर्ट में दावा किया गया कि 23 मौतों का विश्लेषण किया गया, जिनमें से 16 मौतें दूषित पानी के कारण हुईं, तीन मौतों का कारण स्पष्ट नहीं है और चार मौतें अन्य बीमारियों से हुई हैं।
कोर्ट ने सवाल उठाया कि बिना पोस्टमार्टम के यह कैसे तय किया गया कि केवल 16 मौतें दूषित पानी से हुईं। समिति किस आधार पर इस निष्कर्ष तक पहुंची? इस पर सीएमएचओ ने जवाब दिया कि वर्बल आटोप्सी कराई गई थी। जब कोर्ट ने पूछा कि वर्बल आटोप्सी क्या होती है, तो अधिकारी स्पष्ट उत्तर नहीं दे सके।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बागड़िया ने डेथ ऑडिट समिति की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए कहा कि समिति में सरकारी मेडिकल प्रोफेसर शामिल हैं, ऐसे में रिपोर्ट को निष्पक्ष कैसे माना जा सकता है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह स्पष्ट होना चाहिए कि मौतें किन कारणों से हुईं और किन आधारों पर कुछ मौतों को दूषित पानी से असंबंधित माना गया।
- क्या भागीरथपुरा की जनता को उपलब्ध करवाया जा रहा पानी दूषित था।
- पानी दूषित होने की क्या वजह थी। क्या सीवरेज, औद्योगिक वेस्ट या पाइपलाइन लीकेज की वजह से पानी दूषित हुआ था।
- भागीरथपुरा मामले में दूषित पानी के कारण हुई मौतों की वास्तविक संख्या क्या है।
- किस प्रकार की मौतें हुई, इसकी जांच करना।
- दूषित पानी कांड के बाद क्या मेडिकल सुविधा उपलब्ध करवाई गई थी।
- रहवासियों को स्वच्छ पानी उपलब्ध कराने के लिए क्या कदम उठाए गए।
- प्रथमदृष्टया भागीरथपुरा दूषित पानी कांड के लिए कौन अधिकारी दोषी हैं, इसका पता लगाना।
- प्रभावित लोगों को मुआवजे के लिए गाइडलाइन तैयार करने के लिए सुझाव देना।
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि स्थिति बेहद खतरनाक है। भागीरथपुरा मामले की जानकारी मिलते ही हाई कोर्ट परिसर की पानी की टंकी की जांच कराई गई। महू से भी दूषित पानी की खबरें सामने आ रही हैं। कोर्ट ने कहा कि शासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जनता को स्वच्छ और सुरक्षित पानी मिले, लेकिन वर्तमान स्थिति चिंताजनक है।
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सुनवाई के दौरान निगम द्वारा की जा रही पानी की सैंपलिंग पर भी सवाल उठे। वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बागड़िया ने बताया कि निगम केवल आठ बिंदुओं पर पानी की जांच कर रहा है, जबकि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 34 बिंदुओं पर जांच की थी।
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कोर्ट ने आयोग को चार सप्ताह में अंतरिम रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। साथ ही प्रभावित क्षेत्र में नियमित मेडिकल कैंप आयोजित करने और पानी की गुणवत्ता की नियमित जांच कराने के आदेश दिए गए हैं। मामले की अगली सुनवाई पांच मार्च 2026 को होगी।
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