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देश का पहला ओलिंपिक गोल्ड दिलाने वाले इंदौर शहर में ओलिंपियन का टोटा

विश्व ओलिंपिक दिवस 23 जून को देश भर में मनाया जाएगा, लेकिन कम लोग जानते हैं कि स्वतंत्र भारत को पहला ओलिंपिक स्वर्ण पदक इंदौर के पास महू के किशन लाल न...और पढ़ें

By Digital DeskEdited By: Prashant Pandey
Publish Date: Tue, 23 Jun 2026 02:05:26 PM (IST)Updated Date: Tue, 23 Jun 2026 02:11:00 PM (IST)
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देश का पहला ओलिंपिक गोल्ड दिलाने वाले इंदौर शहर में ओलिंपियन का टोटा
किशन लाल।

HighLights

  1. 1948 लंदन ओलिंपिक में किशन लाल की कप्तानी में भारत ने हॉकी में स्वर्ण जीता
  2. किशन लाल ने दूसरे हाफ में नंगे पैर खेलकर अंग्रेजों को परेशान किया, इंग्लैंड को 4-0 से हराया
  3. उन पर फिल्म "गोल्ड" भी बनी और उन्हें पद्मश्री मिला, मगर आज इंदौर में ओलिंपियन का टोटा

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। पूरा भारत जब मंगलवार को विश्व ओलिंपिक दिवस का उत्साह मनाएगा, तब शायद किसी को याद नहीं होगा कि स्वतंत्र भारत को पहला ओलिंपिक पदक इंदौर के एक गुमनाम हीरो ने दिलाया था। कम ही इंदौरी जानते होंगे कि भारत ने वर्ष 1948 के लंदन ओलिंपिक की हाकी स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता था और टीम के कप्तान इंदौर के ही समीप महू में रहने वाले किशन लाल थे।

देश को पहला ओलिंपिक स्वर्ण दिलाने वाले इंदौर में अब ओलिंपिक पदक तो दूर ओलिंपियन का ही टोटा है। वर्ष 1996 ओलिंपिक में इंदौर के पप्पू यादव के बाद से शहर का कोई खिलाड़ी दुनिया के सबसे बड़े खेल मेले में शामिल नहीं हो सका है। मध्य प्रदेश ओलिंपिक संघ के वरिष्ठ उपाध्यक्ष ओम सोनी बताते हैं, इंदौर में खेल गतिविधियां खिलाड़ियों के समर्पण और खेल संगठनों के प्रयासों से जीवित हैं।


अधिकांश खेल संघों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है, फिर भी खेलों के प्रति लगाव के चलते नियमित मैदान पर जाकर प्रशिक्षण देते हैं। इधर-उधर से सुविधाएं जुटाते हैं। खेल मैदान भी अब शहर में सिमटते जा रहे हैं। पहले शासकीय स्कूलों के मैदानों पर खेल गतिविधियां संचालित होती थीं, लेकिन अब वहां भी खेल ‘विकास’ भी भेंट चढ़ने लगे हैं।

प्रकाश हाकी क्लब के सचिव देवकीनंदन सिलावट बताते हैं, ओलिंपिक का सपना देखना अलग बात है, लेकिन मैदान पर सुविधाएं जुटाना होंगी। हमारे यहां तो मैदान तक नहीं हैं। खिलाड़ी यहां-वहां अभ्यास करते हैं। स्टेडियम बनाने या ढांचागत विकास से खिलाड़ी तैयार नहीं होते, इसके लिए मैदान उपलब्ध कराना होंगे। सरकार को चाहिए कि खाली मैदानों का खेल गतिविधियों में इस्तेमाल करने की नीति बनाए, जिससे शासकीय मैदानों पर अतिक्रमण की समस्या भी दूर होगी और खेलों का भी विकास होगा।

किशन लाल ने यूं दिलाया था भारत को पहला ओलिंपिक स्वर्ण

इंदौर के समीप डॉ. आंबेडकर नगर (महू) से निकलकर किशन लाल ने भारतीय टीम को अजेय बनाने का सफर तय किया। देश को वर्ष 1947 में आजादी मिली थी। इसके अगले ही साल (1948 में) अंग्रेजों की मेजबानी में लंदन में ओलिंपिक खेल हुए। भारत से पाकिस्तान अलग हो चुका था और नतीजतन कई अनुभवी खिलाड़ी भी पाकिस्तानी खेमे में थे। किशन लाल को नई और गैर अनुभवी टीम मिली थी।

मगर टीम ऑस्ट्रिया, अर्जेंटीना, स्पेन और नीदरलैंड को हराते हुए भारतीय टीम फाइनल में पहुंची। यहां फाइनल में सामना अंग्रेजों से था। अंग्रेज प्रशंसक भारतीय खिलाड़ियों पर लगातार नस्लीय टिप्पणियां कर रहे थे। पहला हाफ गोलरहित रहा। बारिश भी हुई, इसके बाद दूसरे हाफ में किशन लाल ने अपने जूते उतार दिए और नंगे पैर खेलते हुए अंग्रेजों को परेशान रखा। भारत ने फाइनल 4-0 से जीता और अंग्रेजों के घर (ब्रिटेन) में तिरंगा लहराया। टीम की इस सफलता पर अभिनेता अक्षय कुमार की फिल्म "गोल्ड" भी बनी थी। किशन लाल को भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया था।

ऐसे हुई थी ओलिंपिक दिवस की शुरुआत

अंतरराष्ट्रीय ओलिंपिक दिवस प्रतिवर्ष 23 जून को दुनियाभर में एकता, समानता और खेलों को बढ़ावा देने के विचार को प्रोत्साहित करने के लिए मनाया जाता है। ओलिंपिक दिवस की स्थापना वर्ष 1948 में अंतरराष्ट्रीय ओलिंपिक समिति (आईओसी) के अध्यक्ष जे. सिगफ्रिड एडस्ट्राम द्वारा की गई थी। उस वर्ष पुर्तगाल, ग्रीस, ऑस्ट्रिया, कनाडा, स्विट्जरलैंड, ब्रिटेन, उरुग्वे, वेनेजुएला और बेल्जियम की राष्ट्रीय ओलिंपिक समितियों द्वारा समारोह और खेल आयोजन किए गए थे।

वर्ष 1978 में आइओसी ने आधिकारिक तौर पर सभी संबंधित राष्ट्रीय ओलिंपिक संघों को वार्षिक ओलिंपिक दिवस समारोह आयोजित करने की सिफारिश की। वर्ष 1987 में ओलंपिक दिवस दौड़ को दुनिया भर में एथलेटिक्स को बढ़ावा देने के लिए ओलंपिक दिवस की एक मुख्य गतिविधि के रूप में स्थापित किया गया था।

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