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रजिस्ट्रार पब्लिक ट्रस्ट कोर्ट नहीं, उसके आदेश के खिलाफ सिविल रिवीजन नहीं चलेगी, हाई कोर्ट ने पंचकुइया राम मंदिर रिवीजन अपील की खारिज

मप्र हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि रजिस्ट्रार, पब्लिक ट्रस्ट कोर्ट नहीं है। ऐसे में उसके आदेश के विरुद्ध स...और पढ़ें

By Lokesh SolankiEdited By: Ramnath Mutkule
Publish Date: Sat, 11 Jul 2026 10:58:00 AM (IST)Updated Date: Sat, 11 Jul 2026 10:58:00 AM (IST)
रजिस्ट्रार पब्लिक ट्रस्ट कोर्ट नहीं, उसके आदेश के खिलाफ सिविल रिवीजन नहीं चलेगी, हाई कोर्ट ने पंचकुइया राम मंदिर रिवीजन अपील की खारिज
इंदौर हाई कोर्ट। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. हाई कोर्ट की एकलपीठ ने श्रीराम मंदिर पंचकुइया धार्मिक ट्रस्ट द्वारा दायर सिविल रिवीजन को खारिज कर दिया
  2. हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पब्लिक ट्रस्ट अधिनियम के तहत रजिस्ट्रार को जांच और सीमित प्रक्रिया संबंधी अधिकार दिए गए हैं
  3. इससे वह सिविल कोर्ट का दर्जा प्राप्त नहीं करता। इसलिए उसके आदेश के विरुद्ध सिविल रिवीजन सुनवाई योग्य नहीं है

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। मप्र हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि रजिस्ट्रार, पब्लिक ट्रस्ट "कोर्ट" नहीं है। ऐसे में उसके आदेश के विरुद्ध सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) की धारा 115 के तहत सिविल रिवीजन की अर्जी दायर नहीं की जा सकती। हाई कोर्ट की एकलपीठ ने श्रीराम मंदिर पंचकुइया धार्मिक ट्रस्ट द्वारा दायर सिविल रिवीजन को इसी आधार पर खारिज कर दिया।

महंत रामगोपालदास ने मप्र पब्लिक ट्रस्ट एक्ट, 1951 की धारा 9 के तहत ट्रस्ट की कुछ भूमि को ट्रस्ट की संपत्तियों की सूची से हटाने का आवेदन रिजस्ट्रार पब्लिक ट्रस्ट को प्रस्तुत किया था। लगभग 35 वर्ष बाद प्रस्तुत आवेदन सुनवाई योग्य नहीं है और इसे प्रारंभिक स्तर पर ही निरस्त किया जाए।


यह कहते हुए रजिस्ट्रार पब्लिक ट्रस्ट ने 13 जून 2025 को ट्रस्ट का आवेदन खारिज कर दिया, जिसके विरुद्ध हाई कोर्ट में सिविल रिवीजन दायर की गई। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पब्लिक ट्रस्ट अधिनियम के तहत रजिस्ट्रार को जांच और सीमित प्रक्रिया संबंधी अधिकार दिए गए हैं, लेकिन इससे वह सिविल कोर्ट का दर्जा प्राप्त नहीं करता। इसलिए उसके आदेश के विरुद्ध सिविल रिवीजन सुनवाई योग्य नहीं है।

हालांकि न्यायालय ने ट्रस्ट को यह स्वतंत्रता दी है कि वह सक्षम न्यायिक मंच पर रजिस्ट्रार के आदेश को चुनौती दे सकता है। साथ ही, रजिस्ट्रार को 15 दिन तक अंतिम आदेश पारित नहीं करने के निर्देश भी दिए गए हैं।

लायंस क्लब की चुनावी प्रक्रिया में कोर्ट ने हस्तक्षेप से किया इनकार

इंदौर: लायंस क्लब इंटरनेशनल इंदौर डिस्ट्रिक्ट के पदाधिकारियों के निर्वाचन के मामले में कोर्ट ने हस्तक्षेप से इनकार कर दिया है।क्लब के याचिकाकर्ता सदस्य को कोर्ट ने सुझाव दिया कि क्लब के विधान में जो प्रविधान है उसी के अनुसार पहले आंतरिक उपचार का प्रयास किया जाए।इसके पहले न्यायालय की शरण लेना उचित नहीं है। लायंस क्लब के सदस्य ओमप्रकाश श्रीवास्तव ने व्यवहार न्यायालय में क्लब की निर्वाचन प्रक्रिया के विरुद्ध याचिका दाखिल की थी। इसे कोर्ट ने निरस्त कर दिया।

लायंस क्लब इंटरनेशनल की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता केपी माहेश्वरी के अनुसार पूर्व प्रशासनिक अधिकारी ओमप्रकाश श्रीवास्तव ने अपनी लायंस क्लब की सदस्यता ली थी। बाद में इन्हें क्लब से निलंबित किया गया। लायंस के 2025 व 2026 के निर्वाचन बाबद् प्रक्रिया और चुनाव के परिपत्रों को निरस्त कर चुनाव को अवैध घोषित करने की मांग कोर्ट से की थी। उन्होंने याचिका में कहा था कि लायंस डिस्ट्रिक्ट इंदौर के निर्वाचित पदाधिकारियों को कार्य करने से रोका जाए। जाने व खुद को संस्था की सदस्यता से लायंस इंटनेशनल द्वारा निलंबित नहीं किये जाने पर निषेधाज्ञा चाही थी।

निर्वाचन प्रक्रिया की पारदर्शिता, वैधानिकता पर भी गंभीर प्रश्न उत्पन्न किये थे। प्रतिवादी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर एवं लायंस क्लब की ओर से अधिवक्ता ने कहा कि जिस कांफ्रेस और निर्वाचन प्रक्रिया को चुनौती दी जा रही है।वे दोनो वर्ष की सभाएं व चुनाव विधिवत संपन्न हो चुके हैं, इसलिये अस्तित्वहीन आवेदन सारहीन हो चुका है। लायंस क्लब के किसी भी विधान या नियमों का इस अंतर्राष्ट्रीय सेवा संस्था ने कोई उल्लघंन नहीं किया है।

वादी ओमप्रकाश शर्मा ने अनावश्यक विवाद पैदा किया है, लायंस क्लब के दोनों निर्वाचनों के पदाधिकारी अपना कार्यकाल भी पूर्ण कर चुके हैं। वादी का दावा व्यर्थ और समयबाधित हो चुका है। अगले वर्ष के पदाधिकारी भी अपना पद ग्रहण कर चुके हैं। न्यायालय ने पाया कि, किसी भी प्रजातांत्रिक संस्था के चुनाव को स्थगित करने की मांग सामान्य रुप से न्यायालय के हस्तक्षेप के सीमित दायरे में आती है। इस प्रकार न्यायाधीश द्वारा 18 पृष्ठों का आदेश पारित किया।

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