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उज्जैन-इंदौर मेट्रोपालिटन क्षेत्र अधिसूचना को हाई कोर्ट में चुनौती, उठाए गए कई अहम सवाल

नियमानुसार पहले मेट्रोपालिटन क्षेत्र में शामिल क्षेत्र को परिभाषित किया जाना था फिर अधिसूचना जारी की जाना थी, लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ।

By Kuldeep BhawsarEdited By: Navodit Saktawat
Publish Date: Tue, 23 Jun 2026 07:45:03 PM (IST)Updated Date: Tue, 23 Jun 2026 07:53:19 PM (IST)
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उज्जैन-इंदौर मेट्रोपालिटन क्षेत्र अधिसूचना को हाई कोर्ट में चुनौती, उठाए गए कई अहम सवाल
उज्जैन-इंदौर मेट्रोपालिटन क्षेत्र अधिसूचना को हाई कोर्ट में चुनौती। - एआई जनरेटेड फोटो।

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। उज्जैन-इंदौर मेट्रोपालिटन क्षेत्र को लेकर शासन द्वारा जारी अधिसूचना का मामला हाई कोर्ट पहुंच गया है। इसे चुनौती देते हुए एक जनहित याचिका प्रस्तुत हुई है। इस याचिका में कहा है कि कानूनी बिंदुओं पर विचार किए बगैर अधिसूचना जारी की गई है।

संविधान के 74 वे संशोधन की मंशा स्थानीय निकायों को मजबूती प्रदान करने की है, लेकिन मेट्रोपालिटन क्षेत्र को लेकर जारी अधिसूचना में ऐसा नहीं किया गया।

मेट्रोपालिटन क्षेत्र में जिन स्थानीय निकायों को शामिल किया गया है उससे चर्चा भी नहीं की गई। न ही सुझाव लिए गए। मेट्रोपालिटन क्षेत्र में उज्जैन और इंदौर को शामिल किया गया है, लेकिन इन दोनों शहरों की प्रकृति अलग-अलग है।


मंगलवार को न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की युगलपीठ ने याचिका पर सुनवाई की। याचिकाकर्ता ने याचिका में कुछ संशोधन प्रस्तुत करने की अनुमति मांगी जो उन्हें दे दी गई।

अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद होगी। याचिका एडवोकेट अक्षत पहाड़िया ने दायर की है। याचिका में उज्जैन-इंदौर मेट्रोपालिटन क्षेत्र के नाम में इंदौर को उज्जैन के बाद रखे जाने पर भी सवाल उठाए गए हैं।

याचिका में उठाए मुख्य बिंदु

  • एडवोकेट पहाडिया का कहना है कि कानून कहता है कि जो भी मेट्रोपालिटन क्षेत्र होगा उसके लिए कमेटी बनेगी। इस कमेटी के सदस्यों में दो तिहाई संख्या उन क्षेत्रों के जनप्रतिनिधियों की रहेगी जो मेट्रोपालिटन क्षेत्र में शामिल हो रहे हैं। ऐसा नहीं करते हुए शासन अलग से आथोरिटी बना रहा है। इसके मुखिया मुख्यमंत्री, सदस्य मंत्री और प्रशासन के अधिकारी रहेंगे। शासन मेट्रोपालिटन क्षेत्र के लिए कमेटी तो बना रहा है, लेकिन इस कमेटी के सिर्फ दो सदस्य आथोरिटी में शामिल किए जा रहे हैं। आथोरिटी को पूरी शक्तियां दे दी गई हैं। एक मेट्रोपालिटन कमेटी बनाने की बात कही गई है, लेकिन इसे कोई शक्ति नहीं दी गई।
  • नियमानुसार पहले मेट्रोपालिटन क्षेत्र में शामिल क्षेत्र को परिभाषित किया जाना था फिर अधिसूचना जारी की जाना थी, लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ।
  • क्षेत्रों को मेट्रोपालिटन क्षेत्र में शामिल करने से पहले जनप्रतिनिधियों का पक्ष नहीं जाना गया। स्थानीय निकाय जैसे पंचायत, नगर निगम से सहमति, सुझाव और आपत्तियां नहीं ली गई। इस तरह से जनप्रतिनिधियों की संवैधानिक शक्तियां कम हो जाएगी। यह संविधान के प्रविधानों के विपरीत है।

  • मेट्रोपालिटन क्षेत्र में शामिल क्षेत्रों की प्रकृति एक जैसी होना चाहिए, लेकिन इंदौर प्रदेश की व्यवसायिक राजधानी है तो उज्जैन धार्मिक नगरी। इन दोनों नगर की प्रकृति विपरीत है।
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    इंदौर का शत प्रतिशत तो उज्जैन का 59 प्रतिशत क्षेत्र शामिल है

    • नगरीय विकास और आवास विभाग ने अधिसूचना में शामिल किए गए 16 हजार वर्ग किमी का क्षेत्र निर्धारित किया है। इसमें आधा दर्जन जिले शामिल हैं।
    • इंदौर, देवास, उज्जैन, धार, शाजापुर और रतलाम की कुल 38 तहसीलें इसमें शामिल की गई हैं।
    • इनमें 2781 गांव जुड़े हैं। 75 लाख से अधिक की जनसंख्या का अनुमान लगाते हुए मेट्रोपालिटन की तैयारी की जा रही है। अंतिम रूप से 16000.87 वर्ग किमी का क्षेत्र लिया गया है।
    • 75.34 लाख आबादी का अनुमान लगाया गया है। इसमें इंदौर का शत प्रतिशत क्षेत्र जो कि 3901.63 वर्ग किमी है उसे शामिल किया गाय है।
    • इसी तरह उज्जैन के 6097.99 वर्ग किमी क्षेत्र में से 3595.24 वर्ग किमी क्षेत्र को इसमें शामिल किया गया है। यह लगभग 59 प्रतिशत होता है।