
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। भोपाल की पुश्तैनी जमीन को लेकर वरिष्ठ राजनेता मेनका गांधी और उनकी बहन अंबिका शुक्ला की कानूनी लड़ाई को हाई कोर्ट ने विराम दे दिया है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया व न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने दोनों की रिट अपील निरस्त करते हुए वीएम सिंह के नाम विवादित संपत्ति के नामांतरण का रास्ता साफ कर दिया।
मामला भोपाल के बहेटा, बोरबन और लाऊखेड़ी क्षेत्र की करीब 522 एकड़ जमीन से जुड़ा है। इस विवाद की शुरुआत 1975 में दिल्ली हाई कोर्ट में दायर विभाजन वाद से हुई थी। बाद में परिवार के सदस्यों के बीच समझौता हुआ और 25 अगस्त, 1993 को दिल्ली हाई कोर्ट ने समझौता डिक्री पारित की। इस डिक्री को चुनौती दी गई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 2005 में इसे बरकरार रखा। इसके बाद भी भोपाल की संपत्ति के राजस्व अभिलेखों में नाम दर्ज कराने को लेकर विवाद जारी रहा।
वीएम सिंह के अधिवक्ता उमेश त्रिपाठी के अनुसार उनके पक्षकार ने 2020 में हाई कोर्ट में याचिका दायर कर समझौता डिक्री के आधार पर भोपाल की संपत्ति का नामांतरण कराने की मांग की। दूसरी ओर मेनका गांधी और अंबिका ने आपत्ति जताते हुए कहा कि उन्हें पक्षकार बनाए बिना नामांतरण संबंधी कार्रवाई की गई। उनका तर्क था कि वे मूल पक्षकारों की कानूनी वारिस हैं और उन्हें सुनवाई का अवसर मिलना चाहिए था।
हाई कोर्ट ने पारिवारिक समझौते की शर्तों को महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने कहा कि संबंधित भोपाल की संपत्ति के संबंध में समझौते के बाद अपीलकर्ताओं के अधिकार समाप्त हो चुके थे। इसलिए वे नामांतरण कार्यवाही में आवश्यक पक्षकार नहीं थीं।
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हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता की धारा 32 तहसीलदार को अपने पुराने नामांतरण आदेश की समीक्षा करने की स्वतंत्र शक्ति नहीं देती। हालांकि, नए आधार के सामने आने पर धारा 109 के तहत नया नामांतरण आवेदन किया जा सकता है। कोर्ट ने वीएम सिंह के नए आवेदन को इसी श्रेणी में माना और तहसीलदार के नामांतरण आदेश में कोई अवैधानिकता नहीं पाई।
हाई कोर्ट ने सभी दलीलों पर विचार करने के बाद रिट अपील निरस्त कर दी। इसके साथ ही करीब पांच दशक से चले आ रहे इस पारिवारिक संपत्ति विवाद में वीएम सिंह के पक्ष में राजस्व रिकॉर्ड में नामांतरण का रास्ता साफ हो गया।