
नईदुनिया, जबलपुर। बरगी डैम हादसे की चश्मदीद और पीड़ित वाराणसी निवासी सविता वर्मा ने निजी अस्पतालों और क्रू मेंबरों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि हम मौत को छूकर वापस आए थे, कलेजा हलक में था, लेकिन अस्पताल को हमारी जान से ज्यादा अपने बिल की फिक्र थी।
किसी ने मदद नहीं की
सविता वर्मा ने बताया कि हादसे के बाद जब उन्हें अस्पताल ले जाया गया, तब उनके फोन काम नहीं कर रहे थे और जेब में रखे पैसे भी भीग चुके थे। उन्होंने कहा कि उन्हें पता नहीं था कि किस अस्पताल में ले जाया गया है। कई लोग नाम पूछ रहे थे, लेकिन किसी ने मदद नहीं की। उन्होंने कहा कि हम अपने लोगों के बारे में पूछ रहे थे, लेकिन कोई जानकारी देने वाला नहीं था।
सबसे पहले बिल थमा दिया गया
उन्होंने आरोप लगाया कि अस्पताल में सबसे पहले बिल थमा दिया गया। सविता के अनुसार, एक टीटी और पेनकिलर लगाने के बाद 4700 रुपये का बिल दे दिया गया। उनकी बहन को तीन-चार टांके लगाए गए, लेकिन कोई दवा नहीं दी गई और 4700 रुपये का बिल थमा दिया गया। बाद में वाराणसी में रहने वाले उनके भाई ने ऑनलाइन भुगतान किया।
लाइफ जैकेट का नियम सख्ती से लागू नहीं था
सविता वर्मा ने बताया कि वह 16 साल इजराइल में रहीं और पिछले कुछ वर्षों से वहां युद्ध जैसे माहौल में थीं। उन्होंने कहा कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि अपने देश में इस तरह की घटना का सामना करना पड़ेगा। उनके अनुसार, न तो लाइफ जैकेट का नियम सख्ती से लागू था और न ही क्रू मेंबर्स को आपातकालीन स्थिति से निपटना आता था।
बेटे ने खुद लाइफ जैकेट पहनने के बजाय दूसरों की मदद की
हादसे को याद करते हुए सविता भावुक हो गईं। उन्होंने बताया कि अचानक मौसम बदला और नाव में पानी भरने लगा। लोग घबरा गए, बच्चे चिल्ला रहे थे, लेकिन क्रू मेंबर्स की जगह यात्री ही एक-दूसरे की मदद कर रहे थे। उनके 22 वर्षीय बेटे ने खुद लाइफ जैकेट पहनने के बजाय दूसरों की मदद की और नाव से पानी निकालने का प्रयास किया।
सविता ने बताया कि जब नाव पलटी, उनके हाथ में एक बच्चा था। दो सेकंड के लिए लगा कि सब खत्म हो गया, लेकिन नर्मदा मैया और भोलेनाथ की कृपा से वह पानी से बाहर निकल आईं।
यह भी पढ़ें- एमपी बोट हादसा : फाइबर रीइन्फोर्स्ड प्लास्टिक का बना था क्रूज, दो वर्ष पूर्व हुआ था पूर्ण रखरखाव