
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के हालिया दो आदेशों ने स्पष्ट संकेत दिया है कि पाक्सो मामलों में केवल आरोप या संवेदनशीलता ही पर्याप्त नहीं है। अभियोजन को जहां पीड़ित की आयु जैसे मूल तथ्यों को ठोस साक्ष्यों से साबित करना होगा, वहीं न्यायिक प्रक्रिया में पीड़िता के अधिकारों और सहभागिता की भी अनदेखी नहीं की जा सकती। न्यायालय ने साफ किया है कि पाक्सो कानून में प्रमाण और प्रक्रिया, दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
एक मामले में न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति अवनीन्द्र कुमार सिंह की युगलपीठ ने अधिवक्ता विधि सिंह की ओर से प्रस्तुत अपील स्वीकार करते हुए रीवा की विशेष पाक्सो अदालत द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा निरस्त कर दी। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पीड़िता की नाबालिगता संदेह से परे सिद्ध नहीं कर सका।
आधार कार्ड को जन्मतिथि का निर्णायक प्रमाण मानने से इनकार करते हुए अदालत ने स्कूल रिकार्ड में ओवरराइटिंग और अभिभावकों के बयानों को महत्वपूर्ण माना तथा संदेह का लाभ आरोपित को दिया।
दूसरी ओर, भोपाल के अधिवक्ता यावर खान की पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार अग्रवाल ने कहा कि पीड़िता अथवा उसके अभिभावकों को सुने बिना आरोपी को कोई राहत नहीं दी जा सकती। अदालत ने पीड़िता को पक्षकार बनाने के निर्देश दिए। मामले में राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ब्रम्हदत्त सिंह ने पक्ष रखा।
दोनों आदेश मिलकर यह स्थापित करते हैं कि पाक्सो कानून में न तो कमजोर साक्ष्यों के आधार पर दोषसिद्धि टिकेगी और न ही पीड़िता की भागीदारी के बिना न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।