पत्नी की व्यक्तिगत आय को जांच एजेंसी पति की आय से नहीं जोड़ सकती, हाई कोर्ट का आय से अधिक संपत्ति मामले में आदेश
बालाघाट के कस्तूरबा गांधी छात्रावास में रहने वाली 13 वर्षीय छात्रा ने जिला अस्पताल में बच्चे को जन्म दिया। दुष्कर्म के आरोप में नाबालिग गिरफ्तार किया ...और पढ़ें
Publish Date: Sun, 01 Feb 2026 09:59:16 AM (IST)Updated Date: Sun, 01 Feb 2026 09:59:16 AM (IST)
हाई कोर्ट का आय से अधिक संपत्ति मामले में ऐतिहासिक फैसला।HighLights
- 13 वर्षीय छात्रा ने जिला अस्पताल में बच्चे को जन्म दिया।
- दुष्कर्म के आरोप में नाबालिग आरोपी गिरफ्तार किया गया।
- छात्रावास अधीक्षक को लापरवाही पर निलंबित किया गया।
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। मध्य प्रदेश से सामने आई तीन अहम घटनाएं प्रशासन, न्याय व्यवस्था और समाज की जिम्मेदारी पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। हाई कोर्ट का आय से अधिक संपत्ति मामले में ऐतिहासिक फैसला, चंबल में संकटग्रस्त घड़ियालों के संरक्षण के लिए सरकार का विशेष अभियान और बालाघाट के छात्रावास में नाबालिग छात्रा से जुड़ा बेहद संवेदनशील मामला ये सभी खबरें कानून, पर्यावरण और सामाजिक सुरक्षा के तीनों पहलुओं को उजागर करती हैं। एक ओर न्यायालय ने जांच एजेंसियों को दायरे में रहकर काम करने की सख्त हिदायत दी है, वहीं दूसरी ओर सरकार वन्यजीव संरक्षण और बाल सुरक्षा के क्षेत्र में सक्रिय होती नजर आ रही है। इन घटनाओं का व्यापक सामाजिक और प्रशासनिक प्रभाव पड़ने वाला है।
पत्नी की आय पति से नहीं जोड़ी जा सकती: हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
- जबलपुर हाई कोर्ट की युगलपीठ ने आय से अधिक संपत्ति मामलों में जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए हैं। न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह और न्यायमूर्ति अजय कुमार निरंकारी की पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी सरकारी कर्मचारी के विरुद्ध आय से अधिक संपत्ति की जांच में उसकी पत्नी की व्यक्तिगत और स्वतंत्र आय को पति की आय में जोड़कर असेसमेंट नहीं किया जा सकता।
यह फैसला रीवा निवासी अधिवक्ता मीनाक्षी खरे और उनके पति आलोक खरे की याचिका पर सुनाया गया। आलोक खरे आबकारी विभाग में डिप्टी कमिश्नर हैं, जबकि मीनाक्षी खरे पेशे से अधिवक्ता हैं और विवाह से पूर्व से ही नियमित रूप से आयकर रिटर्न दाखिल कर रही हैं। लोकायुक्त की कार्रवाई और विवाद
- वर्ष 2018 में लोकायुक्त पुलिस ने आलोक खरे के घर और कार्यालय पर दबिश देकर 4 सितंबर 1998 से 15 अक्टूबर 2019 तक की संपत्ति और खर्च का आकलन किया था। लोकायुक्त के अनुसार, इस अवधि में याचिकाकर्ताओं के पास वैध आय स्रोतों से लगभग 88.20 प्रतिशत अधिक संपत्ति पाई गई थी।
जांच एजेंसी ने कुल संपत्ति 10 करोड़ 71 लाख रुपये बताई, जबकि वैध आय 5 करोड़ 69 लाख रुपये मानी गई। इसके आधार पर आलोक खरे के विरुद्ध आय से अधिक संपत्ति का प्रकरण दर्ज कर अभियोजन की स्वीकृति भी दे दी गई। पत्नी की आय को लेकर कानूनी विवाद
- याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में तर्क दिया गया कि मीनाक्षी खरे एक स्वतंत्र पेशेवर अधिवक्ता हैं और उनकी आय को पति की आय में जोड़कर असेसमेंट करना कानून के विरुद्ध है। उन्होंने बताया कि उन्होंने अपनी आय से खेती की जमीन खरीदी थी और उस जमीन से चार करोड़ 81 लाख रुपये की आय हुई।
- यदि दोनों की वैध आय को जोड़कर देखा जाए तो कुल आय लगभग 10 करोड़ 50 लाख रुपये बनती है, जो लोकायुक्त के आकलन से मात्र 21 लाख रुपये कम है और वैध आय से केवल दो प्रतिशत अधिक है। जबकि नियमों के अनुसार यदि संपत्ति वैध आय से 10 प्रतिशत से अधिक नहीं है, तो अभियोजन की अनुमति नहीं दी जा सकती।
हाई कोर्ट की टिप्पणी और आदेश
- हाई कोर्ट ने कहा कि मीनाक्षी खरे द्वारा आयकर रिटर्न दाखिल कर घोषित की गई आय और खेती से हुई आय को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि “इनकम के जाने-पहचाने स्रोत” का अर्थ ऐसी आय से है, जो कानून के अनुसार अर्जित की गई हो और विधिवत टैक्स फाइलिंग से सिद्ध हो।
कोर्ट ने यह भी कहा कि मंजूरी देने वाली अथॉरिटी को अभियोजन की अनुमति नहीं देनी चाहिए थी और प्रारंभिक स्तर पर ही प्रकरण को समाप्त कर देना चाहिए था। इस आधार पर अदालत ने अभियोजन स्वीकृति के आदेश और आगे की सभी कानूनी कार्रवाइयों को निरस्त कर दिया। फैसले का व्यापक प्रभाव
इस फैसले को कानून विशेषज्ञ एक मिसाल के रूप में देख रहे हैं। इससे न केवल जांच एजेंसियों की जवाबदेही बढ़ेगी, बल्कि उन मामलों में राहत मिलेगी जहां पति-पत्नी दोनों की स्वतंत्र आय को एक मानकर गलत तरीके से असेसमेंट किया जाता है। यह निर्णय उन महिलाओं के अधिकारों की भी रक्षा करता है, जो विवाह के बावजूद स्वतंत्र रूप से पेशे या व्यवसाय से आय अर्जित करती हैं।
चंबल में घड़ियाल संरक्षण के लिए सरकार का विशेष सर्वे
- दूसरी बड़ी खबर पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण से जुड़ी है। राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में गंभीर रूप से संकटग्रस्त घड़ियालों के घोंसलों की सुरक्षा और उनकी संख्या बढ़ाने के लिए राज्य सरकार ने चंबल नदी का विशेष सर्वेक्षण शुरू करने का निर्णय लिया है।
चंबल नदी दुनिया के 80 प्रतिशत से अधिक वयस्क घड़ियालों का प्राकृतिक आवास है। वर्तमान में नदी में 2,462 घड़ियाल दर्ज किए गए हैं। इसके अलावा यहां कई दुर्लभ प्रजातियों के कछुए और डॉल्फिन भी पाए जाते हैं। क्यों जरूरी है यह सर्वे?
- घड़ियाल अंडे देने के लिए नदी के किनारे रेत में गहरे गड्ढे खोदकर घोंसले बनाते हैं। लेकिन खनन, अतिक्रमण, मानव गतिविधियों और नदी में आने वाली बाढ़ के कारण इन घोंसलों का बड़े पैमाने पर नुकसान होता है। विशेषज्ञों के अनुसार, प्राकृतिक परिस्थितियों में केवल तीन प्रतिशत बच्चे ही जीवित बच पाते हैं।
- इसी कारण सरकार ने घोंसलों की पहचान, सुरक्षा और संरक्षण के लिए विशेष सर्वे कराने का फैसला लिया है। वन विभाग फरवरी से इस सर्वे की शुरुआत करेगा।
नमामि गंगे परियोजना के तहत संरक्षण प्रयास
- मुख्य वन्यप्राणी अभिरक्षक सुभरंजन सेन ने बताया कि नमामि गंगे परियोजना के तहत चंबल नदी में व्यापक शोध और निगरानी कार्य पहले से जारी है। अब इसे और मजबूत किया जाएगा।
- सर्वे के दौरान न केवल घड़ियालों की नए सिरे से गणना की जाएगी, बल्कि उनके घोंसलों को चिह्नित कर सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी। इसके अलावा नदी में रहने वाली डॉल्फिन और अन्य दुर्लभ जीवों के संरक्षण के लिए भी अलग कार्ययोजना तैयार की जा रही है।
देवरी पुनर्वास केंद्र की भूमिका
- घड़ियालों के संरक्षण में देवरी पुनर्वास केंद्र की भूमिका भी अहम है। हर साल लगभग 200 अंडे घोंसलों से एकत्र कर यहां लाए जाते हैं, जहां उन्हें तीन साल तक सुरक्षित वातावरण में पाला जाता है। इसके बाद इन्हें वापस चंबल नदी में छोड़ा जाता है।
- हाल ही में सरकार ने 10 नए घड़ियाल नदी में छोड़े हैं और एक नई घड़ियाल संरक्षण परियोजना शुरू करने की तैयारी की जा रही है। त्रिराज्यीय निगम बनाने का भी प्रयास हो रहा है, ताकि मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान मिलकर इस प्रजाति के संरक्षण के लिए संयुक्त प्रयास कर सकें।
पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदाय की भूमिका
- वन विभाग के अनुसार, घड़ियाल संरक्षण में स्थानीय समुदाय की भागीदारी बेहद जरूरी है। नदी किनारे रहने वाले लोगों को जागरूक किया जाएगा कि वे घोंसलों को नुकसान न पहुंचाएं और अवैध रेत खनन जैसी गतिविधियों से दूर रहें।
- सरकार का मानना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो यह दुर्लभ प्रजाति भविष्य में और अधिक संकटग्रस्त हो सकती है।
प्रशासनिक लापरवाही उजागर
- तीसरी और सबसे संवेदनशील खबर बालाघाट जिले से सामने आई है, जहां एक कस्तूरबा गांधी बालिका छात्रावास में रहने वाली 13 वर्षीय छात्रा ने जिला अस्पताल के प्रसूति वार्ड में बच्चे को जन्म दिया। यह मामला न केवल एक गंभीर अपराध को उजागर करता है, बल्कि छात्रावास प्रबंधन और प्रशासनिक निगरानी में भारी लापरवाही को भी सामने लाता है।
- पीड़ित बालिका बैहर विकासखंड के एक कस्तूरबा गांधी बालिका छात्रावास में रहती थी और कक्षा आठवीं की छात्रा थी। प्रारंभिक जांच में सामने आया कि वह अक्सर छात्रावास से बाहर जाती थी और वहीं उसकी मुलाकात नाबालिग आरोपित से हुई।
नाबालिग आरोपित गिरफ्तार
- पुलिस ने पीड़ित बालिका से दुष्कर्म कर उसे गर्भवती करने के आरोप में नाबालिग युवक को गिरफ्तार कर लिया है। महिला थाना प्रभारी किरण वरकड़े ने बताया कि मामले की गंभीरता को देखते हुए सभी आवश्यक कानूनी प्रक्रियाएं अपनाई जा रही हैं और पीड़िता को हर संभव सहायता दी जा रही है।
- यह मामला नाबालिगों की सुरक्षा, बाल अधिकारों और पॉक्सो कानून के प्रभावी क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
छात्रावास प्रबंधन की लापरवाही
- जनजातीय कार्य विभाग की सहायक आयुक्त शकुंतला डामोर ने बताया कि प्रारंभिक जांच में यह सामने आया है कि छात्रावास अधीक्षक चैनवती सैयाम ने छात्रा के स्वास्थ्य में हो रहे अस्वाभाविक परिवर्तनों पर ध्यान नहीं दिया। न तो समय रहते उसका स्वास्थ्य परीक्षण कराया गया और न ही उसके अभिभावकों से संपर्क किया गया।
- छात्रा के बार-बार छात्रावास से अनुपस्थित रहने के बावजूद प्रबंधन ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया, जिससे यह गंभीर घटना घटित हुई।
अधीक्षक निलंबित, विभागीय कार्रवाई शुरू
- लापरवाही के लिए छात्रावास अधीक्षक को तत्काल निलंबित कर दिया गया है और उनके विरुद्ध विभागीय जांच शुरू कर दी गई है। विभाग ने यह भी संकेत दिया है कि यदि जांच में अन्य कर्मचारियों की भूमिका सामने आती है, तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी।
- यह घटना कस्तूरबा गांधी बालिका छात्रावास योजना की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठाती है, जो विशेष रूप से वंचित वर्ग की बालिकाओं की शिक्षा और सुरक्षा के लिए बनाई गई है।
बाल सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल
- यह मामला केवल एक छात्रावास या एक जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे राज्य की बाल सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की आवश्यकता को दर्शाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि छात्रावासों में रहने वाली बालिकाएं विशेष रूप से संवेदनशील होती हैं और उनके लिए नियमित स्वास्थ्य जांच, मनोवैज्ञानिक परामर्श और कड़ी निगरानी अनिवार्य होनी चाहिए।
- बाल अधिकार कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि इस घटना की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए और भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों, इसके लिए सख्त दिशानिर्देश लागू किए जाएं।
प्रशासन, न्याय और समाज: तीनों स्तरों पर चुनौती
- इन तीनों घटनाओं को एक साथ देखने पर स्पष्ट होता है कि राज्य प्रशासन और समाज के सामने बहुआयामी चुनौतियां हैं। एक ओर न्यायपालिका जांच एजेंसियों को कानून के दायरे में रहकर काम करने की सख्त हिदायत दे रही है, वहीं दूसरी ओर सरकार पर्यावरण संरक्षण और वन्यजीव सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठा रही है।
- साथ ही, बालाघाट का मामला यह दर्शाता है कि योजनाओं और नियमों के बावजूद जमीनी स्तर पर निगरानी में कमी होने पर गंभीर अपराध घटित हो सकते हैं।
न्याय व्यवस्था का सशक्त संदेश
हाई कोर्ट का फैसला न केवल मीनाक्षी और आलोक खरे को राहत देता है, बल्कि यह जांच एजेंसियों के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि वे स्वतंत्र आय और व्यक्तिगत अधिकारों का सम्मान करते हुए ही असेसमेंट करें। यह निर्णय भविष्य में ऐसे कई मामलों की दिशा तय कर सकता है।
पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सकारात्मक कदम
चंबल में घड़ियाल संरक्षण के लिए सरकार की पहल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। यदि यह सर्वे और संरक्षण योजना प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो न केवल घड़ियालों की संख्या बढ़ेगी, बल्कि चंबल नदी की जैव विविधता भी सुरक्षित रहेगी।
बाल सुरक्षा के लिए सख्त निगरानी जरूरी
बालाघाट की घटना यह भी बताती है कि बाल सुरक्षा केवल कानून बनाने से सुनिश्चित नहीं होती, बल्कि इसके लिए संवेदनशील प्रशासन, जागरूक समाज और जवाबदेह संस्थानों की आवश्यकता होती है। छात्रावासों में रहने वाली बालिकाओं की सुरक्षा के लिए तकनीकी निगरानी, नियमित ऑडिट और जवाबदेही तंत्र को मजबूत करना जरूरी है।